अर्थ व्यवस्था या व्यवस्था का अर्थ

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व्यंग्य

संजय श्रमण

भक्त: ऋषिवर ये अर्थव्यवस्था के उतार चढाव और बढ़ती बदहाली पर आपके क्या विचार हैं? क्या महाबली देश की अर्थव्यवस्था को संभाल सकेंगे ?
ऋषिवर: सुनो वत्स, अर्थव्यवस्था शब्द ही भ्रांतिपूर्ण है, ये नाम ही वास्तु और ज्योतिष के हिसाब से गलत है … इसमें सनातन संस्कारों का कोई अंश नहीं है. इस “अर्थव्यवस्था” शब्द में अर्थ को महत्त्व देकर उसके लिए व्यवस्था करने का आग्रह किया गया है.
लेकिन विश्वगुरु के सच्चे सपूत और संस्कारी संतजन अर्थ की व्यवस्था नहीं करते बल्कि अर्थ को, काम, क्रोध, लोभ, मोह सहित लात मारकर निकल जाते हैं. ये हैं सनातनी संस्कार. लेकिन पुरानी विधर्मी सरकारों ने अर्थ को खूब महत्व देकर बड़ा अनर्थ किया है. उनका काम धर्मसम्मत नहीं था.
आजकल पहली बार भारत के इतिहास में सनातन संस्कारों वाली धर्मप्राण सरकार बनी है. ये सरकार “अर्थ की व्यवस्था” करने नहीं बल्कि “व्यवस्था को नये अर्थ” देने के लिए आई है. याद करो योगऋषि ने व्यवस्था परिवर्तन का जो प्रचंड संकल्प लिया था, वो संकल्प पूर्ण हुआ और और योगऋषि के खुद के आश्रम और व्यापार की व्यवस्था बदल गयी.
अब इसी तरह देश की व्यवस्था भी बदल जाने वाली है. इस सरकार का प्रयास है कि व्यवस्था को ही नये अर्थ दिए जाएँ. पुरानी सरकारों की तरह ये अर्थ की व्यवस्था नहीं करना चाहती.
भक्त: अहा प्रभो अर्थ की व्यवस्था और व्यवस्था का अर्थ – क्या गजब की बात है … आगे और बताएं ऋषिवर मेरी जिज्ञासा बढती ही जा रही है…
ऋषिवर: ध्यान दो वत्स … व्यवस्था में अर्थ खोजने का मतलब है व्यवस्था में नये अर्थ भरना. पुरानी योजनाओं के नये नाम रखना, पुरानी सडकों या नगरों के नये नाम रखना और इस तरह पुराने अर्थ को नये अर्थ से बदल देना. ये सरकार असल में नामकरण संस्कार करने आयी है, उसके बाद उपनयन संस्कार इत्यादि किये जायेंगे.
तुम ज्योतिष के ग्रन्थ देखो वत्स, नाम बदलने से भाग्य बदल जाता है. अगर गाँव गाँव में बिजली पहुंचाने की योजना का नाम राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना रखा जाए तो ज्योतिष और वास्तु के हिसाब ये ये नामकरण गलत है.
इसीलिये गाँव गाँव में बल्ब फ्यूज हो रहे हैं, बिजली के खंभों पर बिजली गिर रही है और बिजली के तारों में करंट नहीं दौड़ पा रहा है. लेकिन इसी योजना का नाम “सौभाग्य योजना” रख दिया जाए तो भारत के भाग्य में सौ का गुणा हो जाता है, एक वाट का बल्ब सौ वाट की रोशनी देते हुए अँधेरे की वाट लगा देता है.
इसी सौ वाट की रोशनी में ग्रामीण किसान अच्छे दिनों को ठीक से देख पायेंगे जो कि वे अभी तक देख नहीं पा रहे थे. और इस सबके पीछे राज सिर्फ इतना है कि वास्तु और ज्योतिष के हिसाब से योजनाओं का नाम बदल दिया जाए.
भक्त: अहा ऋषिवर ये अद्भुत रहस्य बताया आपने … लेकिन प्रभु इन तर्कों से आजकल के कलमुहे कुसंस्कारी पत्रकारों और आलोचकों का मुंह कैसे बंद करेंगे हम?
ऋषिवर: ये सही बात है वत्स कि आजकल के कुसंस्कारी मांसाहारी लोग अर्थव्यवस्था के लुढकने का ढोल पीट रहे हैं. लेकिन चिंता न करो वत्स इसका भी इलाज है हमारे पास, सनातनी शास्त्रों में नाम बदलने के चमत्कार भरे पड़े हैं, व्यवस्था में नये अर्थ देने का पर्याप्त अभ्यास हो चुकने के बाद अब हम उस स्थिति में हैं कि स्वयं अर्थव्यवस्था का ही नाम बदलकर कुछ और रख देंगे. इस संबंध में जयपुर, काशी और पूना के ज्योतिषियों से हमारी चर्चा चल रही है…
भक्त: अहो ऋषिवर … धन्य हैं आप और आपकी लीला …

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