आईपीएस गुप्तेश्वर पांडे ने सुशांत केस में सीबीआई जांच की मंजूरी होने के बाद कहा कि ये एक परिवार नहीं बल्कि देश की 130 करोड़ जनता की जीत है.

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आईपीएस गुप्तेश्वर पांडे ने सुशांत केस में सीबीआई जांच की मंजूरी होने के बाद कहा कि ये एक परिवार नहीं बल्कि देश की 130 करोड़ जनता की जीत है. शायद ही देश ने इससे पहले किसी राज्य के पुलिस मुखिया के मुख से ऐसे बोल सुने होंगे. आंखें बंद कर के सुनें तो यही लगेगा कि ये किसी नेता के बोल हैं. क्योंकि अमूमन नेता ही ऐसे जुमले बोलते हैं. मगर ये नेता नहीं बल्कि बिहार के सबसे बड़े पुलिस अफसर गुप्तेश्नर पांडे हैं. यानी बिहार के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस यानी पुलिस महानिदेशक.

दरअसल, मुद्दा एक मौत का सच पता लगाने का था. पर ठन दो राज्यों की पुलिस में गई थी. मौत के 37 दिन बाद तक मुंबई पुलिस अपनी तफ्तीश करती रही. लेकिन 38वें दिन अचानक बिहार पुलिस ने अपनी एफआईआर की घंटी बजा दी. घंटी की आवाज मुंबई तक पहुंची. फिर क्या था पटना से लेकर मुंबई तक शोर मच गया. शोर बहस में फिर बहस झगड़े में बदल गया. मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में पहुंचा. अदालत ने अपना फैसला सुना दिया और बस उसी फैसले के बाद डीजीपी साहब कैमरे पर आए और फिर क्या खूब बोले. सुशांत सिंह राजपूत को फोन पर कौन करता था परेशान? अब हुआ खुलासा

पर शायद डीजीपी साहब गिनती में थोड़ा गड़बड़ा गए. 130 करोड़ कह कर उन्होंने महाराष्ट्र सरकार, और वहां की पुलिस को भी अपनी गिनती में शामिल कर लिया. जबकि वो लोग तो सीबीआई जांच के खिलाफ थे और ये महाराष्ट्र पुलिस की जीत नहीं हार है. वैसे डीजीपी साहब इतने भर पे नहीं रुके. वे धारा प्रवाह बोलते-बोलते अचानक रिया चक्रवर्ती की औकात तक पर आ गए. एक रिपोर्टर के सवाल पर उन्होंने कहा कि रिया चक्रवर्ती की औकात नहीं है कि वो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर उंगली उठाए.

जरा सोचिए गलती से बिहार पुलिस ही मामले की जांच कर रही होती और रिया को मुंबई से गिरफ्तार कर पटना ले आती तो क्या होता? नेता तो समझ में आते हैं पर एक आईपीएस अफसर जांच और अदालती फैसले से पहले ही एफआईआर में नामजद आरोपी के बारे ऐसी बातें करने लगें तो फिर निष्पक्ष जांच पे कौन भरोसा करेगा?

वैसे एक रिपोर्टर ने डीजीपी साहब की रिया की औकात वाली बात पकड़ ली. पलट कर सवाल भी दाग दिया कि ये क्या कह दिया आपने. डीजीपी साहब फिर भी नहीं रुके. पल भर को कुछ सोचा फिर पूरे दमखम से कहा कि रिकॉर्ड पर कह रहा हूं. पर इस बार औकात गायब था. अब औकात की जगह हैसियत ने ले ली थी.

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अब ये तो डीजीपी साहब ही जानें कि औकात और हैसियत में क्या फर्क है. पर इतना वक्त नहीं था तब. उन्हें अभी बहुत कुछ बोलना था और इसी बोलने पर एक रिपोर्टर ने टोक ही दिया कि आप पुलिस अफसर कम नेता की तरह ज्यादा क्यों बोलते हैं. डीजीपी साहब ने पहले तो रिपोर्टर को हड़काया फिर जवाब दिया खुद मुख्यमंत्री ने कहा कि मैं बोलूं. सो बोल रहा हूं.

खैर, उम्मीद है सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बिहार और महारष्ट्र पुलिस के बीच जारी झगड़ा खत्म हो जाए. खत्म होना भी चाहिए. क्योंकि बात पुलिस और कानून की है. अपराधियों और आंतकवादियों को पकड़ने के लिए अक्सर एक राज्य की पुलिस दूसरे राज्य में जाती है. मुंबई में हुए कई आतंकवादी हमलों के सिलसिले में मुंबई पुलिस बिहार तक गई थी.

बस दुआ यही है कि आगे ऐसा ना हो कि बदले की कार्रवाई के तहत दोनों राज्यों की पुलिस एक-दूसरे की मदद करने की बजाए उन्हें परेशान करने में ही लग जाए. इसलिए डीजीपी साहब इस बात का ख्याल रखते हुए आपको भी एक पुलिस अफसर की तरह बोलना चाहिए ना कि नेताओं की तरह.

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