आखिर इन सिसकते मजदूरों के दर्द का मसीहा कौन होगा ?

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पूरे विश्व की सभी शक्तिशाली देश आज कोरोना जैसे महामारी का शिकार हो चुका है ,हमारा देश भारत भी आज इसका अछूता नहीं रहा है !
परन्तु इस हालात में भारत मे एक गजब की भयावह तस्वीरें हर दिन देखने को मिल रही है जिससे दिल पसीज जाती है ,आँखों मे आँसू की बूंदे दस्तक दे देती है और सोचने को मजबूर कर देती है कि आखिर मजदूर होना इतना बड़ा पाप है क्या ? क्या  एक मजदूर की अहमियत इस लोकतांत्रिक देश मे इतनी मात्र है कि
हम इस आपातकाल के दिनों में मुम्बई ,दिल्ली ,सूरत ,चेन्नई समेत देश के कई कोनो से  अपनी मिट्टी अपनी जमीन को वापस आने के लिए दर – दर भूखे -प्यासे भटकते  पैदल वापस आना पड़ रहा है ! बीच सफर में  एक महिला मजदूर अपने बच्चे जन्म देती है और फिर 2 घन्टे के बाद अपने नवजात बच्चे को   उसकी माँ अपने गोदी में ले कर  तपते रस्ते में चल रही है !  आखिर ऐसा क्यों कि उस  दर्द से तड़पती माँ जो अपने बच्चे  को ले कर भरी दोपहरी में तपते सड़को पर  चलने की नौबत आ गई ! वहीं कई भयावह तस्वीरे जो  दिल को पसीज देती है ट्रकों में पशुओं की तरह मजदूर ढोऐ जा रहे हैं  ,कई मजदूर रेलवे की पटरियों में  रौंदे जाते हैं ? कई साइकिल  से व पैदल हज़ारों किलोमीटर का सफर तय करते हैं ? क्या देश की संचार व्यवस्था कहाँ चली गयी है देश की सरकार की संवेदना कहाँ चली गई है ,सरकार इस आपातकाल में अगर मजदूरों की रक्षा नहीं  कर सकती तो आखिर एक मजदूर व जनता क्यों सरकार चुनती है ????
 एक मजदूर देश के निर्माण में बहुमूल्य भूमिका निभाता है और उसका देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान होता है। किसी भी समाज, देश, संस्था और उद्योग में काम करने वाले मजदूरों की अहम भूमिका होती है। मजदूरों के बिना किसी भी औद्योगिक ढांचे के खड़े होने की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए श्रमिकों का समाज में अपना ही एक स्थान है। लेकिन आज भी देश में मजदूरों के साथ अन्याय और शोषण कहीं ना कहीं से एक बड़ी सवाल खड़ी करती है ?
आज इस लॉकडाउन की वजह से रोजगार खत्म होने के चलते बेहद परेशान मजदूर भूखे-प्यासे तिल-तिल कर मरने के लिए मजबूर है,तथाकथित सरकार  मौन  महलों में बैठकर मजदूरों पर अत्याचार होता देख रहा है। इस सरकार की व्यवस्था के द्वारा मजदूरों के लिए लॉकडाउन के लगभग 45 दिन बीतने के बाद भी कोई अच्छी व्यवस्था नहीं बन पा रही हैं। जिससे उन्हे राहत मिले और ज़िंदगी मे राहत की थोडी सिसकी भरे !
2 पंक्तियों से इस निरंकुश सत्ता को मजदूरों की वेदना बताना चाहता हूँ शायद उनकी दिल पसीज जाए :
“हम मजदूर हैं ,देश की कर्णधार हैं ,
हममे हौसला है नंगे पांव हज़ारों गज चलने की,
पर हम मजदुर हैं ,
मुझे रोटी दो ,भूखे पेट हूँ
है भाग्यविधाता हमे हमारे हौसले ना तोड़ो ,
इस विकट काल में 2 रोटी दो और मेरा घर परिवार से मिलवा दो !”
आज इस आपातकाल में सबसे बड़ी प्रश्न यह उठ रही है कोई भी सरकार इस मजदूरों को उनके घर तक पहुचाने में इतनी कोताही क्यों बरत रही हैं ,आखिर सिस्टम क्यों इतनी बर्बस तरीके से इन गरीबों ,मजदूरों को भूखे पेट रास्ते मे चिलमिलाते कैसे देख पा रही है  ? क्यो उस सिस्टम में बैठे लोगों में वेदना ,संवेदना नहीं है ? क्यो उनके दिल मे मजदूरों के लिए एक पशु के सामान हैं???
लॉकडाउन के 50 दिन होने को है अभी तक सरकार के द्वारा मजदूरों की वेदना पर ध्यान नहीं गयी है जबकि सरकार को इस कोरोना की महामारी का अंदाजा है फिर भी नजरअंदाज कर रही है ! सरकार को शायद इस बात की जानकारी नहीं है कि भारत जैसे देश अगर सिस्टम ऐसे ही सोये रही और ऐसे ही इनकी रवैया रही तो देश मे कोरोना से कम भूख से ज्यादा मौते होगी ! जिस तरह इस आपदा काल मे देश के कौन- कौने से मजदूरों की स्थिति की खबरें आ रही है वह देशहित ,समाजहित ,जनहित के लिए बिल्कुल भी अच्छी नहीं है !
देश में इस आपदाकाल मे भी एक गंदी राजनीति के तहत जिस तरह प्रवासी  मजदूरों के  साथ सौतेला व्यवहार किया गया यह  इस लोकतांत्रिक देश मे बंधुवा मजदूरों की श्रेणी में खड़ा कर देती है! इतिहास इसे काले शब्दों में वर्णन करेगी कि इस आपदाकाल काल मे किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी मजदूरों के साथ किस तरह का व्यवहार किया गया !
अगर हमारे देश की नीति निर्माता व सरकार व सिस्टम  चाहें तो हमारे देश की  रेलवे  व्यवस्था इतनी सुदृढ़ व सुगम परिवहन प्रणाली है कि  कुछ दिनों में ही सारे मजदूरों को वापस उनके घर पहुंचाने की क्षमता रखती है।
 बस दिक्कत है तो केवल सरकार के स्तर पर दृढ इच्छा शक्ति एवं उचित  फैसले लेने की क्षमता की है! और देश के नीतिनिर्माताओं के स्तर पर समय से निर्णय लेने की क्षमता की है।   इस प्रकार की निर्णय से देश मे मजदूरों की घबराहट के चलते बने आपाधापी के माहौल से बचा जा सकता है और मजदूरों की  अस्मिता की रक्षा अच्छे तरीके से की जा सकती है !
सरकार व सत्ता को एक उचित निर्णय  लेना होगा कि मजदूर को रोकना है या घर वापस भेजना है, रोकना है तो उनकी रोजीरोटी का इंतजाम अच्छे से करना होगा और घर वापस भेजना है तो निशुल्क रेल सेवा को तैयार करना होगा। तब ही पैदल, साईकिल, रिक्शा, थ्रीव्हीलर, ढेली व मालवाहक वाहनों में छिपकर जान की बाजी लगाकर श्रमिको ,मजदूरों का जाना रुकेगा।
नही तो इस  आपदाकाल मे सरकार देश मे परेशान बेबस ,लाचार  मजदूरों की गरिमा,जीवन  की रक्षा तभी संभव हो पाएगी कर पायेगी नहीं तो अभी घटित घटनाओं की पूर्णाविर्ती होती रहेगी और सरकार जीवन की रक्षा करने के बजाय मजदूरों की  शवों का दाम लगा कर मुआवजा वितरण कर अपने कर्तव्य का निर्वहन करेगी !
जरूरत है इस आपदा के समय सरकार उचित फैसला ले कर ,एक उचित जन हित फैसला लेकर बेबस जरूरमंद को एक नई जिंदगी देने की कार्य करेगी !
( लेखक प्रशिद्ध  युवा सामाजिक कार्यकर्ता ,लेखक ,मानवाधिकार संस्था एन एच आर सी सी बी के राष्ट्रीय अध्य्क्ष हैं!  केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड एवं  IIM रांची के पालिसी ,लीडरशिप एवं शासन विषय के छात्र रहे चुके हैं !कई प्रमुख संस्थानों में सलाहकार सद्स्य ,कई राष्ट्रीय व राज्यस्तरीय सम्मान भी प्राप्त कर चुके हैं !)