उत्तराखण्ड :-

0
18
कोरोना महामारी और लॉकडाउन के इस दौर में आशाओं की पहचान सबसे आगे काम करने वाले कोरोना वारियर्स की बनी है। कोरोना महामारी के समय स्वास्थ्य विभाग की रीढ़ बनी हुई आशा वर्कर्स इस कोरोना वायरस के दौर और लॉकडाउन में अपने फील्ड में स्वास्थ्य सेवा का कार्य कर रही है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी एडवाइजरी के सारे काम, घर घर जाकर कोरोना मरीजों का सर्वे, जनता के बीच में कोरोना वायरस के बारे में जनजागरूकता फैलाना, इस बात का प्रचार प्रसार करना कि कोरोना वायरस से बचाव कैसे किया जाए, यदि कोई भी व्यक्ति बाहर से आता है तो उसको चेकअप के लिए हॉस्पिटल लेकर जाना और अन्य जो भी कार्य स्वास्थ्य विभाग द्वारा निर्धारित किये जा रहे हैं वे सारे कार्य आशाएँ स्वास्थ्य विभाग के दिशा निर्देश में कर रही हैं। लेकिन इतने काम करने के बाद भी आशाओं को कोई भुगतान नहीं किया जा रहा है और सुरक्षा की सुध लेने वाला भी कोई नहीं है, उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। प्रधानमंत्री द्वारा कोरोना राहत हेतु 20 लाख करोड़ के पैकेज की जो घोषणा की गई उसमें कोरोना की फ्रंट वारियर्स आशाओं के लिए कुछ भी नहीं है। आशाओं के लिए तो सरकार ने फॉर्मूला तय कर दिया है ‘जमकर लेंगे पूरा काम, नहीं मिलेगा कोई दाम’।आखिर ये कब तक चलेगा।” ऐक्टू नेता और उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन के प्रदेश महामंत्री डॉ कैलाश पाण्डेय ने यह बात कही।
उन्होंने कहा कि, “सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने न तो कोरोना संकट में किये जा रहे कार्य के लिए आशाओं को कोई आकस्मिक फंड उपलब्ध कराया है और न ही कोई मानदेय या प्रोत्साहन राशि। आशाएँ अपने स्तर से लगी हैं लेकिन सरकार उनके योगदान का कोई भुगतान करने को तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री द्वारा घोषित पैकेज में भी आशाओं की पूर्णतः उपेक्षा की गई है। ऐसे में वे अपना घर परिवार कैसे चलायेंगी। और अगर कोई आशा इस दौरान संक्रमण की चपेट में आ जाये तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? आशाओं की सुरक्षा के लिए राज्य सरकार कतई गंभीर नहीं है। यूनियन आपसे मांग करती है कि आशाओं को तत्काल प्रभाव से दस हजार रुपये कोरोना राहत भुगतान के साथ उनकी सुरक्षा की ओर भी ध्यान दिया जाए ताकि वो समाज के साथ साथ अपने परिवार की सुरक्षा भी कर सकें।”
ऐक्टू नेता ने बताया कि, “ट्रेड यूनियनों के संयुक्त आह्वान पर 22 मई को होने वाले विरोध में उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन भी शामिल होगी। ट्रेड यूनियनों के राष्ट्रीय समन्वय ने श्रम कानूनों के तीन साल तक स्थगन और काम के घंटे 8 से 12 करने के खिलाफ 22 मई को राष्ट्रव्यापी विरोध काने का फैसला लिया है। सरकारों के इन मजदूर विरोधी फैसलों ने पहले से ही बदहाली झेल रहे मजदूरों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। आज सड़कों पर बड़ी संख्या में मजदूरों की मौतों और बदहाली के लिए मोदी सरकार पूरी तरह जिम्मेदार है।