ऐक्टू का दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रतिवाद

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ऑल इंडिया सेंट्रल कॉन्सिल ऑफ ट्रेड यूनियन्स (AICCTU – ऐक्टू) ने कोरोना लॉकडाउन के बहाने श्रम अधिकारों के खात्मे  के खिलाफ 12-13 मई, 2020 को दोदिवसीय अखिल भारतीय प्रतिवाद का आह्वान किया है. इसके तहत प्रतिवाद के लिए, लॉकडाउन के नियमों का पालन करते हुए मांगों के प्लैकार्ड के साथ अपने घरों में रहते हुए विरोध दर्ज किया गया।
ट्रेड यूनियन ‘ऐक्टू’ के आह्वान के समर्थन में उतरी भाकपा (माले) के उत्तराखंड राज्य सचिव राजा बहुगुणा ने कहा कि, “कोरोना लॉकडाउन में मजदूरों हालत दिन प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है। ऐसा लग रहा है जैसे देश में कोई सरकार है ही नहीं। लॉकडाउन की घोषणा के वक्त प्रधानमंत्री ने बयान दिया था कि ल “अपने यहां काम करने वालों को नहीं निकालें, उनसे संवेदना रखें, उनसे अच्छा व्यवहार करें।” लेकिन अलग-अलग राज्यों में भाजपा सरकार ने श्रम कानूनों को अगले तीन वर्ष के लिए प्रतिबंधित कर दिया है। वे श्रम कानून जो किसी फेक्ट्री मालिक, किसी कम्पनी मालिक के द्वारा मनमाने तरीके से किसी कामगार को न निकाले जाने पर प्रतिबंध लगाते हैं। एकतरफ प्रधानमंत्री अपील कर रहे हैं कि नौकरियों से मत निकालना, एक तरफ उनकी राज्य सरकारें कानून बनाकर मालिकों को अनुमति दे रही हैं कि जब चाहे निकालिए, जब चाहे ठिकाने लगा दीजिए।”
उन्होंने कहा कि, “अब पूंजीपति मक्खी की तरह मजदूरों को जब चाहे निकाल सकता है, और इसके लिए उसे किसी सरकार को, मंत्रालय को, कानून को, किसी ऑथोरिटीज को कोई सफाई देने की आवश्यकता भी नहीं रही है, जैसे कि पहले होती थी। यह शर्मनाक है।”
ट्रेड यूनियन “ऐक्टू” के नेता डॉ कैलाश पाण्डेय ने कहा कि, “श्रम कानूनों को खत्म करने के पीछे सरकार  तर्क दे रही है कि इससे अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में मदद मिलेगी, लेकिन क्या मजदूरों को सुरक्षा देकर किसी राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं की जा सकती? क्या मजदूर राज्यों के, उद्योगों के, फैक्ट्रियों के आधिकारिक गुलाम मान लिए गए हैं? यदि इकॉनमी रिवाइवल करनी है तो वह मजदूरों को सुविधाएं देकर, उन्हें अधिक वेतन देकर भी तो की जा सकती है।”
उन्होंने कहा कि, “किसी देश की अर्थव्यवस्था का रिवाइवल, यदि उस देश के बहुसंख्यक मजदूरों के हितों के साथ समझौता करके किया जा रहा है तो ये भयंकर मानवीय भूल है। ये विकास नहीं विनाश है। ऐसे विकास का कोई अर्थ नहीं रह जाता जिसमें एक वर्ग की सुरक्षा को ठिकाने लगा दिया जा रहा है। मोदी जी जो अपने भाषण में फेक्ट्री मालिकों से मजदूरों को नहीं निकालने की बात कहते हैं, लेकिन उनकी सरकार उन कानूनों को ही निरस्त कर देती है जिनसे मजदूरों की नौकरियों की सुरक्षा मिलती है। ये तो बहुत बड़ा अंतर है, ये तो गजब का दोहरा चरित्र है। देश के प्रधानमंत्री कब तक इस दोहरे चरित्र में जिएंगे?”
उन्होंने जानकारी दी कि, अबतक भाजपा की तीन राज्य सरकारों उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात राज्य ने अपने-अपने राज्यों के श्रम कानूनों पर प्रतिबंध लगाया है।
इन सरकारों ने श्रम औद्योगिक विवादों का निपटारा, व्यावसायिक सुरक्षा, श्रमिकों का स्वास्थ्य व काम करने की स्थिति संबंधित कानून समाप्त कर दिया है, ट्रेड यूनियनों को मान्यता देने वाला कानून भी समाप्त, यानी अगले तीन साल तक मजदूरों का कोई भी संगठन आवाज नहीं उठा सकता, न वे कोई यूनियन बना सकते हैं। अनुबंध श्रमिकों व प्रवासी मजदूरों से संबंधित कानून भी समाप्त। यानी कॉन्ट्रैक्ट मजदूरों को फेक्ट्री मालिक जब चाहे हटा सकते हैं। अगले तीन साल तक सरकारी लेबर इंस्पेक्टर उद्योगों की जांच नहीं कर सकेंगे। यानी कम्पनियों में, फैक्ट्रियों में क्या गड़बड़ियां चल रही हैं, कैसा पानी है, कैसी हवा है, वहां मजदूर कैसी स्थितियों में काम कर रहे हैं, इसकी जांच करने के लिए अगले तीन साल तक कोई नहीं आएगा, कंपनियां अतिरिक्त भुगतान कर सप्ताह में 72 घंटे तक ओवर टाइम करा सकती हैं। शिफ्ट भी बदल सकती हैं। यहां आपको लगेगा कि ओवरटाइम तो Pay  किया जाएगा ही, फिर काम करने में क्या दिक्कत है? लेकिन सोचिए फैक्ट्रियां इस बहाने एक-एक मजदूर से 12-12 घण्टे तक काम ले सकेंगी, ताकि दूसरे श्रमिकों को हायर न करना पड़ेगा। मज़दूरों को कानूनी तौर पर पिसना ही पड़ेगा। बशर्ते उसे ओवरटाइम के पैसे दिए जाएंगे। लेकिन क्या पैसे देकर किसी का जीवन खरीदा जा सकता है? क्या उसे कोल्हू के बेल की तरह सुखाया जा सकता है? मेरा मानना है जीवन में और काम के बीच में एक समुचित संतुलन होना चाहिए। हर मजदूर का हक है कि वह “8 घण्टे काम करे, 8 घण्टे आराम करे, 8 घण्टे अपनी मर्जी से खर्च करे “। काम के घण्टों को बढ़ाकर कहीं न कहीं हम विकास बनाम व्यक्ति की बहस में व्यक्ति को पीछे छोड़ दे रहे हैं। इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है फेक्ट्रियों में मज़दूरों की क्या हालत होने वाली है, 50 से कम श्रमिक रखने वाले उद्योगों व फैक्ट्रियों को लेबर कानूनों के दायरे से बाहर कर दिया गया है। यानी 50 से नीचे काम करने वाली कम्पनियों, ठेकेदारों पर कोई भी सरकारी नियंत्रण नहीं रहेगा, उनके कर्मचारी मालिक भरोसे रहेंगे, संस्थान सुविधानुसार श्रमिकों को रख सकेंगे। श्रमिकों पर की गई कार्रवाई में, यानी उन्हें निकाले जाने पर, दंड दिए जाने पर श्रम विभाग व श्रम न्यायालय का हस्तक्षेप नहीं होगा। सोचिए ये कितना खतरनाक हो सकता है! अन्याय की स्थिति में भी मजदूर कोर्ट नहीं जा सकेंगे, गुजरात में उद्योगों को 1200 दिनों (3.2 साल) के लिए लेबर कानून से छूट प्रदान की गई है। जबकि अन्य राज्यों में 3 साल के लिए छूट दी गई है। मतलब बनियागिरी इस राज्य के खून में नहीं है बल्कि सरकार के खून में भी है। इन्हें मजदूरों की सुरक्षा से कोई मतलब नही, उद्योगों को लेबर इंस्पेक्टर की जांच और निरीक्षण से मुक्ति। फैक्ट्रियां जो चाहे करें, मालिक जो चाहे करें।