कमलेश तिवारी हत्याकांड: पुलिस के दावे, राजनीतिक पेंच और आपसी रंजिश और ढेर सारा भ्रम?

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हिन्दू समाज पार्टी जैसे बहुत ही कम चर्चित पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की शुक्रवार को उनके निवास स्थान खुशेद बाग़ में हत्या को जिस तरह से साम्प्रदायिकता की चासनी में डुबोकर यूपी पुलिस पेश कर रही है, वहीँ कमलेश के परिजनों ने एक स्थानीय बीजेपी नेता पर आरोप लगाते हुए सरकार और प्रशासन को भी संदेह के घेरे में लिया है. इस केस की परत दर परत कहानी में कई पेंच आते जा रहे हैं.

पुलिस ने मिठाई के डिब्बे के गुजराती थ्योरी को आगे बढाते हुए जिस तेज़ी से आरोपियों को आननफानन में गिरफ्तार कर लिया है, और कमलेश के उस बयान को आधार बना रही है जिसमें उसने मुसलामानों की भावनाओं के खिलाफ घृणा से भरे बोल बोले थे. इसको आधार बनाकर गुजरात एटीएस ने तीन लोगों को गुजरात के सूरत से और दो लोगों को यूपी पुलिस ने बिजनौर से हिरासत में लिया है.पुलिस ने गुजरात से जिन लोगों को हिरासत में लिया है, उनमें मौलाना मोहसिन शेख, फ़ैज़ान और राशिद अहमद पठान शामिल हैं. बिजनौर से अनवारूल हक़ और नईम काज़मी को हिरासत में लिया गया है. पुलिस फ़िलहाल इन सभी से पूछताछ कर रही है.”

परिजनों के सवाल

लेकिन दूसरी ओर, कमलेश तिवारी के परिवार वालों का सीधे तौर पर आरोप है कि बीजेपी के एक स्थानीय नेता से उनकी रंजिश थी और इस हत्या के लिए भी वही ज़िम्मेदार हैं.

कमलेश तिवारी की मां कुसुम तिवारी ने शुक्रवार को मीडिया से बातचीत में कहा कि मेरे बेटे को किसी और ने नहीं बल्कि मुख्यमंत्री योगी ने मरवाया है. हालांकि कमलेश तिवारी की सुरक्षा पिछले एक साल से धीरे-धीरे  होती गई. कमलेश तिवारी की मां ने राज्य सरकार पर कमलेश तिवारी के ख़तरे की आशंका को अनदेखी करने का भी आरोप लगाया. इस आरोप को कमलेश तिवारी के एक वीडियो संदेश से भी बल मिल रहा है जिसमें वो अपनी जान को ख़तरा बताते हुए सुरक्षा बढ़ाने की मांग कर रहे हैं और सुरक्षा न बढ़ने के लिए सीधे योगी सरकार को निशाने पर ले रहे हैं. बताया जा रहा है कि ये वीडियो कमलेश तिवारी की हत्या से कुछ ही दिन पहले का है.

डीजीपी के दावे पर कमलेश तिवारी के बेटे सत्यम तिवारी ने सवाल उठाते हुए इसकी जांच एनआईए से कराने की मांग की है. सत्यम तिवारी ने मीडिया से बातचीत में कहा, “मुझे नहीं पता है कि जो लोग पकड़े गए हैं उन्हीं लोगों ने मेरे पिता को मारा है या फिर निर्दोष लोगों को फंसाया जा रहा है. यदि वास्तव में यही लोग दोषी हैं और इनके ख़िलाफ़ पुलिस के पास पर्याप्त सबूत हैं तो इसकी जांच एनआईए से कराई जाए क्योंकि हमें इस प्रशासन पर कोई भरोसा नहीं है.”

पुलिस के दावों में भी विरोधभास

इस मामले में न सिर्फ़ कमलेश तिवारी का परिवार पुलिस के दावों पर सवाल उठा रहा है बल्कि पुलिस की अपनी बातों और गुजरात एटीएस के दावों में भी विरोधाभास दिखाई पड़ रहा है. लखनऊ के एसएसपी कलानिधि नैथानी ने शुक्रवार को घटनास्थल पर पहुंचने के बाद कहा था कि ‘प्रथमद्रष्ट्या यह मामला आपसी रंज़िश का लगता है.’

नैथानी का यह बयान कमलेश तिवारी के परिजनों की आशंकाओं से काफ़ी मेल खाता है जबकि डीजीपी ने इसे चार साल पुराने मामले से जोड़ा है.

वहीं गुजरात एटीएस का कहना है कि उसकी हिरासत में लिए गए तीन लोगों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया है जबकि डीजीपी ओपी सिंह का कहना है कि अभी सबसे पूछताछ की जा रही है.

लखनऊ में क्राइम कवर करने वाले कुछेक पत्रकारों ने मामले को अनावृत करने संबंधी डीजीपी की कड़ियों को बिल्कुल सही ठहराया है जबकि कुछ लोग इसे बेहद जल्दबाज़ी में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की जबरन कोशिश बता पर रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं, “जिस तरह से डीजीपी ने इस मामले को सुलझाने का दावा करते हुए इसे ख़त्म करने की कोशिश की है, उससे लगता है कि कुछ ज़्यादा ही जल्दबाज़ी दिखाई जा रही है. उनके बयान से साफ़ पता चलता है कि उसे एक ख़ास दिशा में मोड़ने की कोशिश हो रही है जबकि परिजनों के आरोपों से साफ़ तौर पर पता चलता है कि इसके पीछे आपसी रंज़िश और ज़मीनी विवाद से इनकार नहीं किया जा सकता.”

सुभाष मिश्र कहते हैं, “जिन लोगों ने एक सँकरी जगह पर जाकर एक व्यक्ति की हत्या कर दी, उसे पुलिस ढूंढ नहीं पा रही है जबकि उसके पास सीसीटीवी फुटेज हैं, नौकर भी पहचानता है, दूसरे अन्य साक्ष्य भी मौजूद हैं. लेकिन एक ही दिशा में पुलिस अपनी तफ़्तीश को केंद्रित रखे है और वहीं से उसे ख़त्म भी करना चाह रही है.”

कमलेश तिवारी का परिवार शुक्रवार को इस बात पर अड़ा था कि बिना मुख्यमंत्री के आए कमलेश तिवारी का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा लेकिन लखनऊ मंडल के आयुक्त और कमलेश तिवारी के रिश्तेदारों के साथ हुए लिखित समझौते के बाद परिजन अंतिम संस्कार करने को राज़ी हो गए.

इस बीच, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार को सुबह 11 बजे कमलेश तिवारी के परिजनों को अपने निवास स्थान पर बुलाकर मुलाक़ात की.

वैसे जिस तरह की राजनीति और सत्ता के संतुलन और सत्ता के पेंच को देखा जाय तो कमलेश तिवारी की दबंग वाली छवि से कुछ नेता और सत्ता के करीबी लोगों के बीच असुरक्षा बोध भी था जिसे कई पत्रकारों और स्थानीय लोगों ने स्वीकार किया. एक पत्रकार नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, “साल 2017 से पहले वो अकसर लखनऊ में धरना-प्रदर्शन करते थे. उन्हें पैग़ंबर साहब के ख़िलाफ़ टिप्पणी के चलते सुरक्षा भी मिल हुई थी.” कमलेश तिवारी की मां ने बताया कि उनके बेटे को सिर्फ़ दो गनर मिले हुए थे जो कि घटना वाले दिन वहां थे भी नहीं.”

साम्प्रदायिकता का पेंच

उत्तर प्रदेश में खुद उग्र फायर ब्रांड हिन्दू सम्प्रद्यिक नेता की छवि मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ की रही है और आज भी जारी है. इसके साथ ही पूरे राज्य में साम्प्रदायिकता का जहर हर जगह फैलाने की पूरी कोशिश रही. इस खेल में खुद इसी ब्रांड में होड़ सी लग भी गयी है. पूरे देश के मुसलामानों सहित उत्तर प्रदेश के मुसलमान पूरी एहतियात के साथ धैर्य का परिचय दे रहा हैं. कुछ राजनीतिक जानकारों का यह भी मानना है कि अयोध्या मामले पर जिस तरह से सांप्रदायिक उन्माद फैलाने की कवायद की जा रही है, उसमे कमलेश त्रिपाठी की हत्या को भी सम्प्रद्यिक रंग देकर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश की जा रही है और उत्तर प्रदेश की पुलिस इसी थ्योरी पर काम कर रही है.

सवाल ये है कि जहर बोने वाले कई बार अपनों के जहर के भी शिकार हो जाते हैं. क्या कमलेश त्रिपाठी की हत्या इसी वैमनस्य का नतीजा तो नहीं है.

हिम्मत सिंह

दिल्ली ब्यूरो