कराहता भारत

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भारत में अब तक कुल संक्रमण एक लाख के पार पहुंच गया है। मगर सियासत है जो थमने का नाम ही नहीं ले रही। मजदुर युही सड़को पर पैदल भूखे प्यासे ताप्ती धुप में चलने को मजबूर है। वही दूसरी तरफ केंद्र सरकार और राज्य सरकार में किसी तरह का कोई समन्वय नहीं बैठ रहा है। आप, कांग्रेस और बीजेपी तीनो में बर्चास्वा की लड़ाई में मजदूरों को केवल पिसा जा रहा है। केवल बड़े बड़े वादे किये जा रहे है पर जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान कर रही है। मजदुर ३००० – ४००० रूपए देकर ट्रको में भेद बकरियों की तरह लदकर एक जगह से दूसरे स्थान पर जा रहे है। किसी प्रकार अपने राज्य तक पहुंच भी जा रहे है तो या तो उनको वापस जाने को कहा जा रहा है या बॉर्डर पर ही उनको रोक दिया जा रहा है। महामारी कोरोना का नहीं राजस्वा और वर्चस्वा का प्रतीत हो रहा है। कोई ऐलान करता है की मजदूरों को खाना और राशन बाट रहे है पर अभी तक केवल और केवल समाज सेवी संसथान ही कुछ है जो इन गरीब मजदूरों को एक पेट भोजन करवा पा रहे है। कितने मजदुर तो रास्ते में ही दम तोड़ दे रहे है। ऊपर से हादसे में कितने मजदुर मर गए। सारी पार्टियों केवल बोलबच्चन बाट रहे है। जब १०० के आस पास कोरोना का मरीज था तब लॉक डाउन कर दिया गया आज आंकड़ा एक लाख के पर पहुंच गया है तो अब लॉक डाउन खोला जा रहा है। ये एक बड़ी साजिश की तरफ इशारा कर रही है।