‘कुछ कदम चल कर रुक जाने वाली बात हो सकती है’

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इस गम्भीर विषय पर चन्द लोगों द्वारा निर्णय लेने के बजाय,बहुत सारे बुद्धिजीवियों की एक विशेष बैठक आपकी तरफ से बुलाई जाए और मंथन हो,कोई सही ठोस नीति बने,तभी कोई सकारात्मक निर्णय लिया जा सकता है।अन्यथा यह मात्र खानापूर्ति होकर रह सकता है तथा शायद कुछ कदम चल कर रुक जाने वाली बात हो सकती है

पटना,12 फरवरी। एक धार्मिक आयोजन में एक वक्ता ने एन.सी.आर.,एन.पी.आर.व सी.ए.ए.के खिलाफत आग उगलने से राजनीतिक में पैर जमाने वाले ईसाई नेताओं में खलबली मच गयी है। इस सम्बन्ध में एस.के.लॉरेंस ने पटना महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष विलियम डिसूजा के नाम खुला पत्र अग्रसारित किया है।

पटना महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष विलियम डिसूजा के नाम खुला पत्र में कहा गया है कि सी.ए.ए. के विषय में ईसाई लोगों द्वारा यह चर्चा की जा रही है कि माँ मरियम की मोकामा यात्रा के दौरान मंच से सी.ए.ए.का विरोध करने का आह्वान किया गया है।चूंकि मैं वहाँ मौजूद नहीं था।अत: क्या घोषणा की गई,यह मुझे जानकारी नहीं है।क्या ऑल इण्डिया लेबल पर आपके बिशप्स ऑर्गनाइज़ेशन की तरफ से सी.ए.ए., एन.आर.सी. तथा एन.पी.आर. पर कोई निर्णय लिया गया है? अगर लिया गया है, तो क्या ? सार्वजनिक तौर पर सभी ईसाइयों को जानकारी होनी चाहिये थी। इस समय लोग दुविधा में हैं।अगर सी.ए.ए. हम ईसाइयों के खिलाफ है,इससे हम ईसाइयों का नुकसान होने वाला है।तो इस विषय पर सभी ईसाइयों को गहरायी से जानकारी देकर ,विचार-मंथन कर ही कोई निर्णय लेने  की जरुरत है।यह भी जरुरी नहीं कि सभी ईसाइयों का एक जैसा ही विचार  बन पाए।अत: अनुरोध है कि इस गम्भीर विषय पर चन्द लोगों द्वारा निर्णय लेने के बजाय,बहुत सारे बुद्धिजीवियों की एक विशेष बैठक आपकी तरफ से बुलाई जाए और मंथन हो,कोई सही ठोस नीति बने,तभी कोई सकारात्मक निर्णय लिया जा सकता है।अन्यथा यह मात्र खानापूर्ति होकर रह सकता है तथा शायद कुछ कदम चल कर रुक जाने वाली बात हो सकती है।

मान लिया जाए कि कोई सरकारी प्रतिनिधि किसी ईसाई व्यक्ति से सी.ए.ए. या अन्य विषयों  पर उसकी सहमति लेने आता है और वह व्यक्ति आपके सुझाव के अनुसार सी.ए.ए. या अन्य का विरोध कर देता है।फिर उस सरकारी प्रतिनिधि की शिकायत पर उस ईसाई व्यक्ति के खिलाफ कोई  कार्यवाही होती है।तब उसे बचाने कौन आएगा? क्या कोई जिम्मेदारी लेगा ? क्योंकि आजतक शायद ईसाई समुदाय(विशेष तौर पर अयाजक वर्ग) को मजबूत बनाने का प्रयास नहीं किया गया है और न कभी सार्वजनिक तौर पर उनके साथ बैठक कर विचार विमर्श किया गया है।।हमारे बीच बहुत सारे ऐसे लोग होंगे,जो शायद सार्वजनिक तौर पर खुलकर अपने आप को ईसाई कहने तथा किसी सरकारी दस्तावेज में ईसाई होने की स्वीकृति दर्ज नहीं करेंगे। अत: कितने प्रतिशत ईसाई लोग इसके विरोध में सामने आएंगे? यह अनिश्चित है।

उम्मीद करता हूं कि सी.ए.ए. जैसे गम्भीर विषय पर कुछ करने से पहले  बहुत सारे बुद्धिजीवियों की बैठक कर कोई राय बनाने पर अमल किया जाए तथा गम्भीरता से विचार कर पहल किया जाए।

आलोक कुमार