फीचर
प्रभात रंजन दीन

गर्भधारण रोकने के लिए भारतीय महिलाओं को डी.एम.पी.ए (DMPA) दवा इंजेक्ट की जा रही है.

डी.एम.पी.ए. मतलब “डिपो मेडरॉक्सी प्रोजेस्टेरोन एसिटेट” (Depot Medroxy Progesterone Acetate).

दुनिया के कई देशों में खतरनाक यौन अपराधियों की यौन ग्रंथी नष्ट करने के लिए उन्हें सजा के बतौर डी.एम.पी.ए. दवा का इंजेक्शन दिया जाता है, जिसे मेडिको-लीगल शब्दावली में ‘केमिकल कैस्ट्रेशन’ (chemical castration) कहते हैं.

यह दवा पुरुषों और महिलाओं के शरीर को घातक रूप से नुकसान पहुंचाती है.

‘चौथी दुनिया’ के पास दुनिया भर के चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह और रिपोर्ट, चिकित्सा शोध संस्थाओं के रिसर्च पेपर्स, अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा प्रतिष्ठानों की रिपोर्ट्स, सामाजिक विशेषज्ञों की राय, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सामाजिक-अकादमिक फोरम पर रखे गए शोध-पत्र और दवा कंपनी की तकनीकी प्रोडक्ट रिपोर्ट्स हैं.

इसके अलावा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का वह आधिकारिक ‘फ्रॉड’मूल-आधार है, जिसने ऐसे अमानुषिक कृत्य का पर्दाफाश करने का रास्ता खोला और ‘मिशन परिवार विकास’ के नाम पर महिलाओं की देह में ज़हर चुभोये जाने का सरकारी योजना का सच सामने आ सका.

कुछ प्रमुख वेब-मीडिया संस्थानों ने इस खबर को देश के जरूरी मुद्दे की तरह उठाया.

समाचार चैनल ‘न्यूज़-24’ ने ‘चौथी दुनिया’ की पूरी खबर दिखाई, उसे ‘वाइरल’ भी बताया और आखिर में एक ही झटके में उसे ‘झूठा’ घोषित कर दिया.

‘चौथी दुनिया’ की खबर की समीक्षा करते हुए ‘न्यूज-24’ ने केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे और दिल्ली के गंगाराम अस्पताल की गायनोकोलॉजिस्ट डॉ. माला श्रीवास्तव से एक झटके में बयान लिया और दूसरे झटके में खबर को ‘झूठा’ बता कर कार्यक्रम का शटर गिरा दिया.

केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री और गायनोकोलॉजिस्ट ने क्या कहा, इसका हम तथ्यवार विवरण आपके समक्ष रख रहे हैं.

‘चौथी दुनिया’ ने अपनी पिछली कवर स्टोरी (8 से 14 जनवरी 2018) में सात प्रमुख बिंदु सामने रखे थे.

वे सात मुद्दे ‘चौथी दुनिया’ की कवर-स्टोरी के केंद्रीय तत्व हैं.

समाचार चैनल ‘न्यूज-24’ ने इन तथ्यों को दिखाया जरूर, लेकिन अपनी तथाकथित छानबीन में इन सात केंद्रीय तत्व पर ध्यान केंद्रित नहीं किया.

इन बिंदुओं पर न अपनी कोई जानकारी हासिल की, न कोई पढ़ाई की और न कोई शोध किया.

चैनल ने महज दो लोगों (केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री और गायनोकोलॉजिस्ट) से फौरी तौर पर बयान लिया और खबर के आधारभूत तथ्यों पर कोई पत्रकारीय सवाल-जवाब भी नहीं किया.

उन्होंने जो कहा उसे ‘जजमेंट’ समझ लिया.

केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने तो फिर भी सत्ता-चरित्र से जरा अलग हट कर थोड़ी ईमानदारी बरती.

हालांकि उन्होंने एक सरकारी नुमाइंदे की तरह ही बयान दिया और सरकार के कृत्य को सही ठहराया, लेकिन यह भी कहा, ‘दवा के साइड-इफेक्ट्स हो सकते हैं, हम इसे खारिज नहीं करते’.

दिल्ली के गंगाराम अस्पताल की गायनोकोलॉजिस्ट डॉ. माला श्रीवास्तव ने डीएमपीए दवा के बारे में बताने के बजाय उसे लगवाने के तौर-तरीके बताने शुरू कर दिए; फिर कहा कि डीएमपीए इंजेक्शन से माताओं के दूध पर कोई असर नहीं पड़ता.

गायनोकोलॉजिस्ट ने माताओं के शरीर पर होने वाले नुकसान की कोई चर्चा नहीं की और न ‘न्यूज-24’ ने उनसे ये सवाल पूछे. जानकारी रहती तो सवाल पूछते. डॉक्टर ने दूध पर ही कहा और चैनल ने दूध पर ही कार्यक्रम रोक दिया.

डीएमपीए इंजेक्शन माताओं के शरीर पर क्या-क्या घातक नुकसान करता है, इसके आधिकारिक विस्तार में जाने से पहले हम दूध पर ही बात कर लें.

भोपाल गैस त्रासदी में सुप्रीमकोर्ट द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच और सलाहकार समिति की सदस्य रहीं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की ख्यातिप्राप्त चिकित्साशास्त्री डॉक्टर सी. सत्यमाला कहती हैं कि डीएमपीए इंजेक्शन महिलाओं और उसकी आने वाली संतति के लिए बेहद खतरनाक (हैज़ार्डस) है.

इसका एक इंजेक्शन भी लगवाना खतरनाक है. यह स्तन-पान कराने वाली महिलाओं के लिए और भविष्य में खुद स्वस्थ रह कर स्वस्थ बच्चे की मां बनने की चाहत रखने वाली मां के लिए अत्यंत नुकसानदेह है.

डॉक्टर सत्यमाला का कहना है कि डीएमपीए के असर पर शोध में जो तथ्य हासिल हुए, वे इस दवा के इस्तेमाल को पूरी तरह खारिज करते हैं.

डेविड वार्नर की चिकित्साशास्त्र की मशहूर किताब ‘व्हेयर देयर इज़ नो डॉक्टर’ में डीएमपीए पर पांच साल शोध करने के बाद तैयार किया गया डॉ. सी. सत्यमाला का शोध-पत्र प्रकाशित किया गया है, जिसने पूरी दुनिया के चिकित्साशास्त्रियों और वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है.