कैमूर

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चांद का दीदार होते ही शुरू होगा पाक-ए-रमजान माह

चांद का दीदार होते ही पाक-ए-रमजान माह शुरू हो जाएगा। जैसे ही चांद दिखेगा युवा व बच्चे आतिशबाजी शुरू कर देंगे। घर के बड़े-बुजुर्ग हाथों में थैला लिए सेहरी के लिए बाजार करने निकल पड़ेंगे। महिलाएं सेहरी की तैयारी में जुट जाएंगी। इस भीषण गर्मी में रोजा रखना किसी इम्तिहान से कम नहीं होगा। रहमतो व बरकतों का यह महीना अच्छे कामों का सवाब देने वाला होता है। इसी वजह से इसे नेकियां कमाने का महीना भी कहा जाता है।

कहते हैं इसी महीने में पवित्र कुरान नाजिल हुआ, जिसमें जीने के आदाब और मुकम्मल निजाम हयात है। अच्छे बुरे और सही गलत की तमीज इसी कुरान ने दी। महिलाओं का सम्मान और पड़ोसियों का अधिकार कुरान ने सिखाया। इस माह में जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। अल्लाह तआला की नजर अपने बंदों पर रहती है। इस महीने में रोजेदार कसरत से तिलावत और इबादत करते अपने बुरे कर्मों के लिए माफी भी मांगते हैं। बुरे कर्मों से तौबा कर इबादत करते हैं। इस कारण इंसान के सारे गुनाह धुल जाते हैं।

रब की खुशी के लिए उठाते हैं तकलीफ

भभुआ के हाफिज अली इसन कहते हैं माहे रमजान में नफिल नमाजों का सवाब फर्ज के बराबर माना गया है। इस महीने में बंदा अपने रब की रजामंदी के लिए भूखे-प्यासे रहकर खुद को अल्लाह की इबादत में मशगूल कर लेता है। उसका कोई भी लम्हा बेकार नहीं जाता। बंदा अपने रब की खुशी के लिए तकलीफ उठाता है। इसलिए खुदा भी अपने बंदों की हर दुआ कबूल फरमाता है।

खुदा की रहमतों की होती है बारिश

वृद्ध रमजान अंसारी बताते हैं कि रमजान के महीने को तीन अशरों (अवधि) में बांटा गया है। पहली दस दिनों की अवधि रहमत की कहलाती है, यानी शुरू के दस दिनों में बंदों पर खुदा की रहमतों की बारिश होती है। दस दिनों का दूसरा अशरा मगफिरत का होता है। इसमें नेक बंदा अपने गुनाहों की जो भी माफी मांगता है, उसे अल्लाह कबूल फरमाते हैं। आखिरी अशरा निजात यानी जहन्नम से छुटकारे का होता है। इस तरह देखा जाए तो रमजान का पूरा महीना अल्लाह की रहमतों का है।

रोजा हर बालिग मुसलमान पर फर्ज

रमजान का रोजा इस्लाम का एक अहम इबादत है। यह बिना किसी माफी के हर मुसलमान मर्द-औरत पर फर्ज है। रमजान के महीने में इंसान खुद को हर बुराई से दूर कर सकता है। हदीस (इसलामी धर्म ग्रंथ) में है-‘रमजान शहरुल्लाह। यानी रमजान अल्लाह का महीना है। इस महीने में इबादत का सवाब सत्तर गुना अधिक बढ़ जाता है। नफिल (नमाज) का सवाब फर्ज के बराबर और एक बार सुबहान अल्लाह कहने का सवाब एक लाख के बराबर होता है। इसलिए इस महीने के पल-पल को नमाज और कुरान पाक की तिलावत (पाठ) में गुजारनी चाहिए। यह सब्र का महीना है और सब्र करने का सवाब जन्नत है।