कोटा

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पानी में बही किसान की उम्मीद…

एफसीआई कर्मियों व ठेकेदार की मनमानी से नही तुल पाया गेंहू

कोटा। पानी क्या बरसा किसानों के चेहरों की खुशी मायूसी में बदल गई। भामाशाह मण्डी में दोपहर के समय किसान अपनी उपज के जिन ढ़ेरों को देख फूला नहीं समा रहा था शाम के समय उसी फसल को पानी से निकालता हुआ नजर आया। यह वह किसान थे जिनकी उपज को आज ही तुलना था। लेकिन एफसीआई के कर्मचारियों  व ठेकेदार की मनमानी के कारण आदेश के बाद भी किसानों को बारदाना नहीं दिया गया। जिस कारण किसान की उपज पानी में तैरती नजर आई।

दोपहर बाद ही मौसम का मिजाज बदलने पर मण्डी में तुलाई का काम दोगुनी गति से चलने लगा था। किसान भी खुले में पड़ी अपनी जीन्स को लेकर चिंतित था। जिन किसानों की जीन्स बाहर खुले में पड़ी हुई थी, वह तो बाजारों में जाकर पहले से ही पाल पन्नी का इन्तजाम कर चुके थे। कुछ किसान अपने साथ ही तिरपाल लेकर आए थे। ज्यों-ज्यों उनकी जीन्स की तुलाई होती जा रही थी किसानों की चिंता खत्म हो रही थी लेकिन जिन किसानों की उपज का मौल नहीं लग पाया था, वह किसान तो कैसे भी कर अपनी उपज को बेचने की तैयारी में थे चाहे 10-20 रूपये कम के भाव में ही क्यों ना बेचनी पड़े।

शाम को ज्यों ही बरसात शुरू हुई मण्डी में अफरा तफरी जैसा माहौल हो गया। किसानों ने अपनी उपज को पाल पन्नियों से ढ़ककर बचाने की हर मुमकिन कोशिश की लेकिन पानी के साथ किसानों की उपज भी बहकर जाती रही व नाले उपज से अट गए। चनों की स्थिति तो यह थी कि यार्ड में पानी भर चुका था। बरसात बन्द होने के बाद जैसे तैसे किसानों ने पानी में बहती अपनी उपज को समेटना शुरू किया। किसानों की एक ही पीड़ा थी कि मण्डी में आने के बाद भी भीगने के कारण उन्हें उनकी फसल की उचित कीमत नहीं मिल पाएगी।

किसी ने बेचा तो किसी ने बोरियों में भरा

हिंगोनियां के किसान भैरूलाल ने तो अपने गेंहू को 1661 रूपयेे की कीमत से ही मण्डी में बेच दिया तो दोलतपुरा के किसान शिवराज ने अपनी उपज को भीगने से बचाने के लिए बोरियों में भरवाया। जिसका प्रति बोरी 8.55 रूपये स्वयं को वहन करने पड़े। जबकि गेंहू की सरकारी खरीद दर 1840 रूपये है।