कोलकाता वेस्ट बंगाल में ममता बनर्जी के एक और भरोसमंद सहयोगी ने उनसे किनारा कर लिया है।

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कोलकाता
वेस्ट बंगाल में ममता बनर्जी के एक और भरोसमंद सहयोगी ने उनसे किनारा कर लिया है। नाम है यू.एन. बिस्वास। उनका परिचय यह भर नहीं है कि वे 2011 से 2016 तक ममता कैबिनेट में मंत्री थे और 2016 का चुनाव हार जाने के बाद भी ममता ने उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे रखा है, बल्कि इससे कहीं बड़ा परिचय यह है वे सीबीआई के अतिरिक्त निदेशक के पद से रिटायर हुए हैं। बिहार में चारा घोटाले में उन्हीं की जांच लालू के जेल जाने की वजह बनी थी। लॉकडाउन के दौरान उन्होंने कई किताबें लिखी हैं, जो अगले कुछ महीनों में आने वाली हैं। माना जा रहा है कि वे सियासी गलियारों में बड़ा धमाका करेंगी। बिस्वास से बात की एनबीटी के नैशनल पॉलिटिकल एडिटर नदीम ने। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश:
सीबीआई के इतने नामचीन अफसर रहने के बाद राजनीति में आने की रुचि कैसे पैदा हुई?
मैं 2002 में रिटायर हुआ। राजनीति में मेरी एंट्री 2011 में हुई। नौ साल का गैप यह बताने के लिए पर्याप्त है कि सेवा में रहते हुए न मैंने राजनीति में आने का कोई जुगाड़ बनाया और न ही राजनीति में आने की कोई इच्छा थी। ममता को क्यों चुना?
मैं मूलत: बंगाल का ही हूं। 2011 वह साल था, जब ममता बंगाल में बदलाव के लिए लड़ रही थीं। राजनीति में आने का अनुरोध ममता की तरफ से ही हुआ था। मैं भी बंगाल में बदलाव चाह रहा था। इस वजह से मैंने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
कहा जाता है कि एक वक्त आप उनके बहुत विश्वासपात्र थे…
हां, यह सच है। 2011 में चुनाव जीतने के बाद उन्होंने मुझे कैबिनेट मंत्री बनाया। 2016 में मेरी हार पर वे हतप्रभ थीं। मैंने उन्हें बताया कि पार्टी के ही लोगों के भितरघात की वजह से हार हुई है, तो उन्होंने कहा कि दादा, आप कैबिनेट मिनिस्टर थे और रहेंगे। उन्होंने मुझे अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग विकास निगम का अध्यक्ष बना दिया, जो कैबिनेट मिनिस्टर रैंक का है। अचानक आपका ममता से मोहभंग क्यों हो गया?

मैं उन लोगों में नहीं हूं जो सच को देखकर भी चुप रहते हैं। सिस्टम में मैंने करप्शन को पांव पसारते देखा तो मैं खामोश नहीं रहा। शायद यही वजह रही कि सत्ता में आने के बाद पार्टी का जो खांचा बना, उसमें मैं धीरे-धीरे अनफिट होता गया। मेरा उपयोग संगठन में करने के बजाय मुझे किनारे लगाया जाने लगा। यहां तक कि पार्टी की बैठकों में भी बुलाया जाना बंद कर दिया। मुझे लगता है कि टीएमसी के साथ मेरी दस साल की जो पारी थी, वह पर्याप्त थी। अब इसके साथ और आगे नहीं बढ़ा जा सकता।
दूसरे भी बहुत सारे लोग हैं जो ममता बनर्जी से अलग हो रहे हैं। इसकी क्या वजह है ?
बगैर वजह तो कोई पार्टी नहीं छोड़ेगा। जो लोग भी पार्टी छोड़ रहे हैं, वे खुद को सहज नहीं पा रहे हैं।
करीबी लोगों को पार्टी छोड़ने से मना करने की कोशिश ममता करती हैं या नहीं?
करती हैं, लेकिन स्थितियां बेकाबू होती जा रही हैं। शुभेंदु अधिकारी की पोजिशन पार्टी में ममता और उनके भतीजे के बाद नंबर तीन पर थी। जब उन्होंने पार्टी छोड़ी तो ममता ने उन्हें मनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी।
कहा जा रहा है कि पार्टी के अंदर वाया अभिषेक बनर्जी प्रशांत किशोर का बहुत ज्यादा हस्तक्षेप हो गया है…
मैंने भी यह बात सुनी है। पार्टी के लोग उस शख्स का हुक्म बजाने को बाध्य नहीं हो सकते, जो खुद किसी खास काम को अंजाम देने के लिए नौकरी पर रखा गया हो।
बंगाल में आप क्या राजनीतिक परिदृश्य देख रहे हैं?
अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। थोड़ा और इंतजार करना होगा। बहुत सारे गठबंधन बन रहे हैं। उन गठबंधनों का एक बार शेप तय हो जाए तभी चुनावी तस्वीर साफ हो जाएगी।

बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक रखी है, उसे आप किस स्थिति में पाते हैं?
वह मजबूती के साथ उभरी है। एंटी एन्कबेंसी फैक्टर का लाभ भी उसे मिल रहा है। लेकिन कितनी सीटें वह जीतेगी, यह अभी नहीं कहा सकता।
मुख्य मुकाबला टीएमसी बनाम बीजेपी है या फिर टीएमसी- बीजेपी- महागठबंधन के बीच तिकोनी लड़ाई होगी?
बंगाल का चुनाव सीधे तौर पर ममता बनर्जी और नरेंद्र मोदी के बीच है। करप्शन चुनाव का एक बड़ा मुद्दा होगा। आप किसके साथ दिखेंगे?
बेईमानी और ईमानदारी के बीच की लड़ाई में मैं ईमानदारी के पाले में खड़ा रहना अपना धर्म समझता हूं। बीजेपी में आपका जाना तय माना जाए?

क्या मैंने ऐसा कुछ कहा?
बंगाल में ओवैसी फैक्टर कितना असर डालेगा?
मुस्लिम पॉकेट्स में ओवैसी एक फैक्टर हैं, लेकिन अभी यह कहना मुश्किल है कि वे चुनावी नतीजों को कितना प्रभावित करेंगे।
चर्चा है कि आपकी कुछ किताबें बम बनकर फूटने वाली हैं?
मैंने लॉकडाउन का इस्तेमाल सच को शब्दों का जामा पहनाने में किया है। एक किताब आ गई है और कुछ अगले महीनों में आने वाली हैं।
उस पुस्तक का इंतजार ज्यादा है, जिसमें आपने सारदा घोटाले को बिहार के चारा घोटाले से भी बड़ा करार दिया है…
उस किताब के लिए थोड़ा और इंतजार करना होगा।