चेन्नई

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चेन्नई. पहले लॉकडाउन की मार और बाद में बाढ़ से तबाही के चलते चाय बागान से जुड़े मजदूरों के जीवन पर गहरा असर पड़ा है। इस उद्योग से जुड़े लोग संकट में हैं। कोरोना काल में हर्बल उत्पादों की मांग बढ़ी है जिसमें हर्बल चाय भी शामिल है। राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्तान ने भी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली हर्बल चाय की बात कही थी। दरअसल लॉकडाउन का सीधा असर चाय बागानों पर पड़ा। यही वह समय था जब चाय की खेती प्रमुखता से होती है, लेकिन इस दौरान लॉकडाउन लगा रहा। चाय कारोबार से जुड़े लोग बताते हैं कि इस तरह के हालात पहले भी रहे हैं जब कई बार जलवायु परिवर्तन का असर चाय बागानों पर पड़ा। लेकिन इस बार हालात अधिक भयावह है। पहले लॉकडाउन और बाद में बाढ़ के हालात से पैदा हुई परिस्थितियों ने चाय बागान को तहस-नहस कर दिया।
असम, तमिलनाडु व पश्चिम बंगाल में चाय अधिक
इंडियन टी बोर्ड के अनुसार असम देश में सबसे बड़ा चाय उत्पादक राज्य है। देश के चाय उत्पादन में असम का योगदान करीब 50 फीसदी है। एक चौथाई हिस्सा पश्चिम बंगाल का है। तमिलनाडु व केरल के कुछ हिस्सों में भी चाय के बागान है। इन बागानों से करीब 30 लाख लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। इनमें मजदूरों व महिलाओं की बड़ी संख्या है।
सवा छह लाख हैक्टेयर क्षेत्र में चाय बागान
देश में चाय के कुल रकबे की बात करें तो करीब सवा छह लाख हैक्टेयर क्षेत्र में चाय के बागान है। जिनमें लगभग 2 लाख 15 हजार हैक्टेयर के बागान छोटे चाय उत्पादकों के है।
701 मिलियन किलोग्राम के साथ चाय उत्पादन में असम पहले नबर पर है। पश्चिम बंगाल 344 मिलियन किलोग्राम चाय उत्पादन के साथ दूसरे नंबर पर है।