झारखंड: पलाश के फूल कार्यक्रम से साबर बच्चों को उच्च जीवनशैली सीखा रही हैं पूर्व आईएएस सुचित्रा सिन्हा

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सुचित्रा सिन्हा, पूर्व आईएएस- झारखंड के दलमा पहाड़ की तलहटी में बसा नक्सल प्रभावित माकुला गांव। इस गाँव में विलुप्त होते सबर जनजाति समुदाय का बसेरा है। नक्सल प्रभावित इलाका होने के कारण यहां सरकारी सुविधाएं ना के बराबर पहुंचती है। सरकारी सुविधा या जागरूकता के अभाव में यहां के बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे थे, जिसे देखकर एक आईएएस ने इन बच्चों की मदद का बीड़ा उठाया। इस आईएएस का नाम है सुचित्रा सिन्हा, जो वर्तमान में झारखंड के रांची में रहती हैं। उन्होंने जून 2020 से सरायकेला जिले के सबर जनजाति समुदाय के बच्चों की मदद का बीड़ा उठाया हुआ है। कुछ समय पहले सरायकेला में हो रही लगातार बारिश के कारण सबर बच्चों की पढ़ाई के लिए बना मिट्टी का घर ढह गया था जिस कारण बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही थीं, लेकिन आईएएस सुचित्रा सिन्हा ने सरकार से किसी तरह का सहयोग नही मांगा और खुद के पैसों से शेड का निर्माण करबा रहीं हैं, इस शेड की लागत लगभग 79 हजार रुपये आएगी। वर्तमान में वह चार गांव के 124 सबर बच्चों का सारा खर्चा स्वयं उठा रहीं हैं। इसके लिए उन्होंने अपने परिचय के 70 लोगों से फंड इकट्ठा किया है।

साबर बच्ची- वही ” पलाश के फूल” कार्यक्रम के माध्यम से आदिम जनजाति के बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना, साफ स्वास्थ्य और शिक्षा के प्रति जागरूक करना ही इनका लक्ष्‍य है। सुचित्रा सिन्‍हा भारतीय नारी की सेवा भावना का एक मिसाल भी है। सरायकेला खरसावां जिला के नीमडीह प्रखंड अंतर्गत भंगाट, माकुला, बुरुडीह, समनापुर, बिंदुबेड़ा आदि गांव के लुप्तप्राय आदिम जनजाति (सबर) के सैकड़ों परिवार के बच्चे उन्हें नाम से नहीं मानव सभ्यता के सबसे अनमोल शब्द ” मां “के नाम से जानते हैं और पुकारते भी हैं। वहीं बच्चों ने बताया कि रोजाना सुबह  तुम्ही हो बंधु सखा तुमी हो….प्रार्थना के साथ दिन की शुरुआत होती है। (UNA)