दिल्ली के जंतर मंतर पर NRC के विरोध को लेकर बड़ी रैली निकली गयी

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UNA/Delhi Bureau
14 अक्टूबर 2019
 

एन.आर.सी./असम को रद्द करने, एन.पी.आर. रद्द करने, नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 को वापस लेने की मांग के साथ सैंकड़ों की संख्या में मंडी हाउस से मार्च व जंतर मंतर पर धरना

आज दिल्ली के जंतर मंतर से असम में विघटनकारी NRC को रद्द करने और नागरिकता में संसोधन के लिए लाये गए विधेयक के के खिलाफ सैकड़ों लोगों ने मार्च निकला. यह मार्च एनआरसी और फासीवाद विरोधी जन मोर्चा के बैनर तले निकाला गया जिसमे करीब एक दर्जन राजनीतिक पार्टियाँ एवं सामाजिक संगठन शामिल हैं. वाम संगठनों, जनवादी व बहुजन ताकतों, मजदूरों, दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक, महिला व सभी उत्पीड़ित वर्गों और तबकों एवं जन आंदोलनों के सैकड़ों समर्नेथकों और कार्यकर्ताओं ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया.
असम में 19 लाख लोगों को देश की नागरिकता से असंवैधानिक रूप से बेदखल करने के खिलाफ इस NRC को रद्द करने  और आरएसएस की विचारधारा थोपने और भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए इस सांप्रदायिक फासीवादी एनआरसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की तमाम कोशिशों के खिलाफ़ यह मार्च किया गया.
जंतर मंतर पर जब यह मार्वच पहुंचा तो यह एक सभा में बदल गया और सभी वक्ताओं ने  सरकार पर आरोप लगाया कि यह सरकार सभी क्षेत्रों के फासिवादीकरण की प्रक्रिया को तेज़ करते हुए, श्मोरमिकों और बहुजनों पर हमले तेज कर दी है और लगातार झूठ बोल रही है एवं तथ्य छुपा रही है कि उसकी आर्थिक नीतियों ने पिछले 5 सालों में अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है. लाखों मजदूरों-कर्मचारियों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ रहा है, बेरोज़गारी चरम पर है, कृषि क्षेत्र का संकट गहराता जा रहा है. इन सब पर पर्दा डालने के लिए, हर क्षेत्र और हर मुद्दे को सांप्रदायिक बनाया जा रहा है. नफ़रत और असहिष्णुता का माहौल बनाया जा रहा है, जो मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) जैसी घटनाओं को तेज़ी से अंजाम दे रहा है. अपनी मनमानी चलाने के लिए यह सरकार फासीवादी आतंक फैला रही है. जम्मू-कश्मीर की जनता के साथ भी यही किया जा रहा है जहाँ अनुछेद 370 और 35ए को 5 अगस्त को रद्द कर वहां की जनता की एक भी बात बिना सुने जम्मू-कश्मीर से राज्य का दर्जा छीन कर उसे केंद्र-शासित प्रदेश में तब्दील कर दिया गया. पूरे राज्य का सैन्यकरण कर दिया गया है, अधिकारों पर रोक लगा दी है और संचार के साधन बंद हैं. भिन्न भाषाओं व संस्कृतियों वाले देश, भारत, की विविधता को जानबूझकर नज़रंदाज़ कर हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तान के नारे थोपने की कोशिश की जा रही है. यहाँ तक कि एक राष्ट्र-एक पार्टी तक की बात भी होने लगी है.
गैर-संवैधानिक तरीके से निर्मित किये व सुप्रीम कोर्ट द्वारा तेज़ी से लागू किये गए एनआरसी/असम की अंतिम सूची 31 अगस्त 2019 को निकली जिसने 19,06,657 लोगों को राज्यविहीन बना दिया. इसमें से बड़ी संख्या आदिवासी और दलितों की हैं, जिन्हें अंग्रेजों द्वारा बिहार, झारखण्ड आदि राज्यों से प्लांटेशन पर मजदूरी करवाने के लिए ले जाया गया था. इसमें नेपाली भी शामिल हैं और लगभग आधी संख्या मुस्लिम अल्पसंख्यकों की है, जो सब अभी असम राज्य के निवासी हैं. उन्हें विदेशी ट्रिब्यूनल व उच्च न्यायालयों के सामने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 120 दिन की अवधि दी गई है, नहीं तो इन सबको डिटेंशन कैम्पों में डाल दिया जाएगा. यह एक घोर अमानवीय कदम है.
वक्वताओं  ने आरोप लगाया कि सरकार किसी भी तरह से नागरिकता (संशोधन) बिल 2016 पारित करने का प्रयास कर रही है, जो लोक सभा में 8 जनवरी 2019 को पारित हो चुकी है. यह बिल संविधान के सेक्युलर मूल्यों के बिलकुल विरुद्ध है और सावरकर के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की तरह ही मुस्लिमों के खिलाफ सांप्रदायिक भेदभाव को बढ़ावा देता है, और उसी के साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से आये केवल अन्य धर्मों के प्रवासियों, जिसमें हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, क्रिस्चियन आते हैं, के लिए नागरिकता हासिल करना सरल बना देता है.
भाजपा के मंत्री सभी राज्यों में एनआरसी लागू करने की मांग उठा रहे हैं ताकि गहराती आर्थिक मंदी से बढ़ते जा रही जनता की परेशानियों से जनता का ध्यान भटकाया जा सके. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 31 जुलाई को एक अधिसूचना के माध्यम से अखिल भारतीय स्तर पर एक राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) समयबद्ध रूप से 30 सितम्बर, 2020 तक तैयार करने की घोषणा की है. अगर यह एनपीआर प्रक्रिया नागरिकता कानून में प्रस्तावित संशोधन के साथ लागू होती है, तो 4 से 5 करोड़ लोग, जो भारत में पैदा हुए और यहीं के निवासी हैं, राज्यविहीन बना दिए जायेंगे. यह एक भयावह परिस्थिति और एक अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी को जन्म देगा. इसलिए हम मांग करते हैं की एनपीआर की पूरी प्रक्रिया को खारिज कर दिया जाए और भारत में पैदा हुए और वर्तमान में रह रहे हर इंसान को संवैधानिक सिद्धांतों के तहत भारतीय नागरिक होने की मान्यता दी जाए.
कॉमरेड अरुण मांझी ने प्रतिरोध सभा की अध्यक्षता की और भिन्न संगठनों के प्रतिनिधि, जैसे कॉमरेड केएन रामचंद्रन, परवेज मिया, राधेश्याम, ठाकुर खनल, ज्योति, दामोदर, विमल त्रिवेदी केके सिंह, शिवमंगल सिद्धान्तकर, उदय झा, केके नियोगी, फिलिप क्रिस्टी, नसीम अहमद रहमानी, आदि ने वक्तव्य रखे. राष्ट्रपति को एक डेलीगेशन द्वारा लोगों को बांटने और देश को कमज़ोर करने वाले एनआरसी प्रक्रिया को रोकने और लोगों के संवैधानिक अधिकारों का संरक्षण करने के लिए जल्द से जल्द कार्रवाई करने का आह्वान करते हुए ज्ञापन सौंपा गया जिसमें कॉमरेड उमाकांत, एनडी पंचोली, नरेन्द्र शामिल थे.
एनआरसी एवं फासीवाद विरोधी जन मोर्चा इन मांगों को पूरा करवाने के लिए इस संघर्ष को आगे बढ़ाएगा और ऐसी सोच रखने वाली सभी न्याय्पसंद, जनपक्षीय ताकतों को लामबंद करने का प्रयास करेगा. इस फ्रंट के घटक संगठन हैं: भाकपा (माले) रेड स्टार, न्यू डेमोक्रैटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया, लोक समीति, सिटिज़न्स फॉर डेमोक्रेसी, बहुजन कम्युनिस्ट पार्टी, सर्वहारा लोकपक्ष, टीयूसीआई, लोकपक्ष, ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल, मूल प्रवाह अखिल भारत नेपाली एकता समाज, भाकपा (माले) न्यू प्रोलेटारियन, डेमोक्रैटिक पीपुल्स लौयर्स एसोसिएशन, बस्ती सुरक्षा मंच, ऑल इंडिया पीस मिशन, भगत सिंह मंच, ऑल इंडिया क्रिश्चयन माइनॉरिटी फ्रंट, जन संघर्ष
हिम्मत सिंह
ब्यूरो प्रमुख, दिल्ली