दिल्ली चुनाव में कांग्रेस ने क्यों घुटने टेक दिए, आखिर हालत क्यों खराब है?

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सम्पादकीय टिपण्णी

दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी में दिल्ली की हार को लेकर एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाए जा रहे है। दिल्ली प्रदेश के प्रभारी पी सी चाको मरहूम शीला दीक्षित पर आरोप लगा रहे है, कि कांग्रेस की साख स्वर्गीय शीला दीक्षित के समय 2013 से ही खराब हो चली थी उधर जल्दबाज़ी में प्रदेश अध्यक्ष बनाये गए सुभाष चोपड़ा ने हार की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया जो हाई कमान को सौंपा जाना है। कांग्रेस देश की 125 साल पुरानी राजनीतिक पार्टी है और आज हालात ऐसे बन गए है की 70 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों में से सिर्फ तीन उम्मीदवार ही अपनी जमानत राशि बचा पाए है। बाकी 67 उम्मीदवार अपनी जमानत जब्त करा चुके है।

इस हार का सबसे बड़ा कारण आज कांग्रेस के पास जमीनी कार्येकर्ता ही नही है। और जो कार्यकर्ता है उनके सुझावों पर गौर ही नही होता और उनसे शीर्ष पदों पर बैठे नेतागण जो हाई कमान के नजदीकी हैं जो जमीनी कार्यकर्ता से मिलना पसन्द नहीं करते। पिछले 6 सालों में जब से पी सी चाको को प्रदेश प्रभारी बनाया गया है तब से आम और जमीनी कार्यकर्ता की कोई सुनवाई नहीं है। जितने भी शीर्ष पदों पर बिठाए गए (हाईकमान) द्वारा निर्धारित नेता जिनका कोई जमीनी जुड़ाव नहीं है, वो सिर्फ चेहरा दिखाने में व्यस्त रहते है। उन्हें ही अपने ऊपर जिम्मेदारी लेकर अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए। अगर अभी भी कांग्रेस को होश नही आया तो फिर कभी होश नही आएगा

सबसे खतरनाक पहलू तो यह है कि दिल्ली प्रदेश में दिल्ली के नेताओं और कार्यकर्ताओं को कोई तवज्जो नही दी जाती। दिल्ली में दक्षिण भारतीय नेताओं का बोलबाला है। जो अपनी इंग्लिश के बल पर पार्टी और पार्टी के संवाद को हाइकमान तक लेकर जाते हैं और शब्दों को तोड़मरोड़ कर पेश करते हैं। इनके पास कोई भी योजना पार्टी को लेकर नहीं है। ये राजनीतिक पार्टी को भी ऐसे चला रहे हैं जैसे अपने व्यापार को चला रहे हैं। कांग्रेस का अपना कहा जाने वाला अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी तथा झुग्गी झोपड़ी स्लम में रहने वाला परम्परागत वोट उसके हाथ से निकल कर आम आदमी पार्टी में शिफ्ट हो गया है। जिसकी वजह से आज कांग्रेस की हालत इतनी खराब हो गई कि दिल्ली चुनाव में एक विधानसभा क्षेत्र में तो सिर्फ 800 ही वोट आये। इससे पता चलता है कि कांग्रेस अपने परंपरागत वोट को समेटने में विफल हुई है।आज भी लोगो में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति और विश्वास है परन्तु पार्टी में बड़े स्तर के बदलाव लाने होंगे और युवाओं को आकर्षित करना होगा। आज भारत की आबादी का 60 से 65% युवा वर्ग है।और देश की आधी आबादी महिलाओ की है। कांग्रेस को अगर मजबूत होना है तो इनके लिए भी योजनाएं बनानी होगी ।

Philip Christy
Editor-in-Chief