पंजाब में मोदीः सुरक्षा-चूक या लोकतंत्र पर संघ का नया हमला?

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अनिल सिन्हा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पंजाब से लौटने की कथा भारतीय लोकतंत्र पर संघ
परिवार के हमले की पुरानी कहानी ही दोहरा रही है। चुनाव के मौकों पर यह हमला तेज हो जाता है। समाज के सांप्रदायिक विभाजन, केंद्रीय एंजेसियों के इस्तेमाल और धन-बल के जरिए चुनाव जीतने को भाजपा ने एक तरीका बना लिया है। भाजपा हर बार इसे ही अपनाती है। इस कथा में उनके विरोध में खड़ा हर व्यक्ति, विपक्ष की हर पार्टी और लोगों के लिए आवाज उठाने वाला हर संगठन देशद्रोही बन जाता है। मोदी फिरोजपुर की रैली में खाली पड़ी कुर्सियों को संबोधित करने की हिम्मत जुटा नहीं पाए। वहां जाकर विभाजन पैदा करने वाला कोई भाषण देने से चूक गए तो उससे भी जहरीला जुमला बोल कर निकल गए।

वह पूरे पंजाब को बदनाम कर गए हैं ताकि उत्तर प्रदेश जाकर यह रोना रो सकें कि पंजाब में तो उनकी जान लेने की कोशिश थी और कह सकें कि वहां के लोग उनकी जान का प्यासे हैं। लेकिन इस नौटंकी के जरिए उन्होंने सिर्फ किसानों को फिर से आंतकवादी और कांग्रेस को उनका समर्थक नहीं ही बताया है बल्कि देश की सुरक्षा एजेंसियों को भी बदनाम कर दिया है। उन्होंने विदेशों में देश की साख गिरा दी है कि यहां के प्रधानमंत्री अपने ही राज्य का दौरा करने में सुरक्षित नहीं महसूस करते हैं। इस कथा ने यही साबित किया है कि सत्ता में बने रहने के लिए मोदी तथा अमित शाह की जोड़ी देश की किसी भी संस्था, समूह और क्षेत्र को दांव पर लगा सकती है।

प्रधानमंत्री की पंजाब यात्रा को अगर सिलसिलेवार ढंग से बताया जाए तो चीजें एकदम सामान्य नजर आती हैं। प्रधानमंत्री को फिरोजपुर में एक रैली संबोधित करनी थी। वह बटिंडा हवाई अड्डे पर उतरते हैं। उन्हें हेलिकाप्टर से फिरोजपुर जाना है। लेकिन तेज बारिश और खराब मौसम की वजह से उन्हें रोक रखा जाता है। लेकिन प्रधानमंत्री तय करते हैं कि वह सड़क मार्ग से जांएगे।

अब उनकी यात्रा के सुरक्षा इंतजामों का जायजा ले लीजिए। प्रधानमंत्री की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी एसपीजी की है। देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो इसके बारे में सारी खुफिया जानकारियां जमा करती है। पूरे रास्ते की सुरक्षा का जायजा लेने के बाद ही एसपीजी उनकी यात्रा जारी रहने देता है। स्थानीय पुलिस को वह जैसा आदेश देता है उसे वैसा करना होता है।

जब प्रधानमंत्री ने सड़क मार्ग से जाने का फैसला लिया तो एसपीजी को यह जानकारी जरूर रही होगी कि रास्ते में किसान खड़े हैं। प्रधानमंत्री अपने गंतव्य से 30 किलोमीटर दूर ही थे कि उन्होंने लौटने का फैसला किया क्योंकि आगे रास्ता रोक रखा गया था। जाहिर है कि एसपीजी को यह जानकारी बहुत पहले मिल गई होगी। इस जानकारी के लिए उसे पंजाब की पुलिस पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। केंद्रीय खुफिया एंजंसियों को यह काम हर हाल में करना होता है। सड़क पर प्रदर्शनकारियों से काफी पहले प्रधानमंत्री का काफिला एक फ्लाईओवर पर रोक लिया गया और वह आराम से लौट आए।

उधर फिरोजपुर के रैली स्थल पर नजर डालें तो मोदी जी के लौटने का कारण साफ हो जाता है। रैली में सत्तर हजार कुर्सियों में से ज्यादातर खाली हैं। इन कुर्सियों को कैप्टन अमरिंदर संबोधित कर रहे हैं। खाली कुर्सियों की खबर के बाद मोदी वहां जाने की कोशिश क्यों करते? वह कुछ देर और रुकते तो सड़क खाली हो ही जाती। किसान तो तहसील कार्यालय जा रहे थे मोदी के विरोध का ज्ञापन देने। उन्हें तो पता ही नहीं था कि प्रधानमंत्री इस रास्ते जाएंगे। उन्हें तो पुलिस ने इस वजह से रोका तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। पंजाब पुलिस उन्हें वापस जाने के लिए बात कर रही थी कि प्रधानमंत्री लौट आए। पुलिस को इसका दोषी बताया जा रहा है कि उसने सड़क खाली कराने में सख्ती नहीं की। प्रधानमंत्री की रैली के विरोध में प्रदर्शन नहीं करने के लिए वहां की सरकार ने किसानों को मना लिया था। लेकिन उससे हरियाणा की भाजपा सरकार की तरह काम करने के लिए कैसे कहा जा सकता है?

प्रधानमंत्री के अपमानजनक बयान के बाद भी कि वह बठिंडा हवाई अड्डे जिंदा लौट पाने के लिए मुख्यमंत्री का धन्यवाद करते हैं, पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने अपना आपा नहीं खोया। कांग्रेस पर प्रधानमंत्री की जान लेने के लिए खालिस्तान को समर्थन देने का आरोप लगाने के बावजूद वह प्रधानमंत्री की रक्षा की कसमें खा रहे हैं। लेकिन उन्होंने यह भी साफ किया कि किसानों के खिलाफ सख्ती का उनका कोई इरादा नहीं था।

सवाल उठता है कि भाजपा प्रधानमंत्री की जान खतरे में का शोर मचाने में क्यों भिड़ गई? इसे समझना मुश्किल नहीं है। किसे नहीं पता है कि पंजाब में भाजपा की कोई हैसियत नहीं है? चंडीगढ़ के स्थानीय चुनावों के नतीजे ने भी बता दिया है कि अकाली दल के सहारे उसे जो थोड़ी-बहुत जगह मिली थी, वह उसे कायम नहीं रख पाई। अपनी नगण्य उपस्थिति के बाद भी वह पंजाब में क्यों सक्रिय है? इसके लिए हमें किसान आंदोलन और लखीमपुर खीरी पर नजर दौड़ाना पड़ेगा।

वह उत्तर प्रदेश और देश के बाकी हिस्सों में एक सिख विरोधी माहौल बनाना चाहती है। किसानों के आंदोलन को भी उसने सिख आतंकवदियों से जोड़ने की बहुत कोशिश की थी, लेकिन किसानों ने इसे सफल नहीं होने दिया। लखीमपुर खीरी की घटना से सीधे जुड़े केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी को मंत्रिमंडल से नहीं हटाने के पीछे भी यही रणनीति काम कर रही है।

इस सारे मामले में गोदी मीडिया की भूमिका सदा की तरह अत्यंत निंदनीय है। वह भाजपा की इसी कहानी को मजबूत करने में लगा है कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक हुई है। अगर यह हुई भी तो इसके लिए खुद प्रधानमंत्री और उनकी सुरक्षा में लगे अधिकारी जिम्मेदार हैं। क्या किसानों को प्रधानमंत्री के खिलाफ प्रदर्शन का हक नहीं है? हर प्रदर्शन को आंतकवाद बताना और हर विरोधी को देशद्रोही बताना फासीवाद है।

दिलचस्प यह है कि सिख आतंकवाद ने कांग्रेस की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उसीके मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की जान ली थी। पंजाब के आतंकवाद में जान गंवाने वालों में वामपंथी कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या है। प्रसिद्ध वामपंथी कवि अवतार सिंह पाश की जान खालिस्तानी आंतकवादियों ने ली थी। आरएसएस ने कभी आतंकवाद से लोहा नहीं लिया। लेकिन आतंकवाद के नाम पर सांप्रदायिक विभाजन में सबसे आगे है।

सवाल यह उठना चाहिए कि विरोधी पार्टी के शासन से दुश्मनी का रिश्ता रखने और संघीय ढांचा बिगाड़ कर देश को नुकसान पहुंचाने की इजाजत भाजपा को क्यों दी जानी चाहिए? अपने आपको देशभक्त घोषित कर देने से काम नहीं चलेगा। उसे इसे साबित करना होगा। मोदी सरकार ने सात सौ किसानों को सिर्फ इसलिए मरने दिया कि अडानी को गोदाम अनाज से भर जाएं और वह मनमानी कीमत पर इसे खरीद या बेच सके। किसानों, मजदूरों, बुद्धिवीजियों, अल्पसंख्यकों को देशद्रोही बताने वाली सरकार लोकतंत्र विरोधी है। फिरोजपुर की कथा यही साबित करती है। प्रधानमंत्री का जिंदा लौट आने का जुमला, शाह का कांग्रेस को पागल बताने वाला बयान तथा भाजपा की ओर से कांग्रेस को खालिस्तान की खूनी साजिश में साथ देने का आरोप लोकतंत्र के रसातल में जाने के संकेत हैं।

(न्यूज़ पोर्टल जन चौक से साभार)

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