पटना, में कांटे की लड़ाई के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने सत्ता संभाल ली है और नीतीश कुमार सातवीं बार मुख्यमंत्री बन गए

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पटना, में कांटे की लड़ाई के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने सत्ता संभाल ली है और नीतीश कुमार सातवीं बार मुख्यमंत्री बन गए हैं, लेकिन इस बार सरकार की सूरत बदली-बदली सी है। भारतीय जनता पार्टी के बढ़े कद का प्रभाव अभी से दिखने लगा है। सुशील कुमार मोदी की जगह उप मुख्यमंत्री पद पर दो नए चेहरों का आना और जदयू के बजाय विधानसभा अध्यक्ष का पद भाजपा की झोली में जाना इसकी बानगी है। वहीं जदयू कोटे से मंत्री बने मेवालाल चौधरी का तीन दिन के भीतर इस्तीफा भी नीतीश सरकार के लिए एक झटके से कम नहीं है, जिसने विपक्ष के हौसले भी बुलंद कर दिए हैं।
सोमवार को नीतीश कुमार सहित 15 मंत्रियों ने शपथ ली। इसमें दो उप मुख्यमंत्री समेत सात भाजपा कोटे से, नीतीश सहित छह जदयू कोटे से व एक-एक हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा व विकासशील इंसान पार्टी से शामिल थे। लेकिन शपथ लेते ही बुरी बीती मेवालाल चौधरी पर। विपक्ष उनकी पुरानी फाइल खोलकर हमलावर हो गया। जब वे सबौर कृषि विश्वविद्यालय में कुलपति थे, तो उस समय 161 सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति में बड़े पैमाने पर घोटाला हुआ था। नियुक्ति में पात्रता और प्रावधानों की अवहेलना हुई थी। इस पूरे प्रकरण की जांच चल रही है। नीतीश कुमार ने जदयू कोटे से उन्हें मंत्री पद की शपथ दिला दी। बस, हार से तिलमिलाए विपक्ष को मुद्दा मिल गया। उसने हल्ला मचाना शुरू कर दिया। पहले तो उसे नजरअंदाज किया गया और मेवालाल को शिक्षा विभाग दे दिया गया, लेकिन जब लगा कि मामला गंभीर है तो नीतीश कुमार ने उन्हें बुलाकर बात की, जिसका परिणाम यह निकला कि कार्यभार ग्रहण करने के घंटे भर बाद ही उनका इस्तीफा आ गया। अब बैकफुट पर आया जदयू इसे नैतिकता बता रहा है, शुचिता के उच्च मापदंड का पालन ठहरा रहा है। जबकि विपक्ष इसे अपनी जीत समझ रहा है।
दरअसल कम सीटें आने के बावजूद नीतीश कुमार मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन सबसे ज्यादा फायदे में भारतीय जनता पार्टी ही रही। नतीजे के साथ ही दिखने लगा था कि इस बार उसके तेवर बदले दिखेंगे, शपथ ग्रहण से ही वह दिखने भी लगा। नीतीश कुमार के जबरदस्त पैरोकार सुशील कुमार मोदी को किनारे करके उसने दो उप मुख्यमंत्री बना दिए। क्षेत्रीय और जातीय संतुलन साधते हुए तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी को उप मुख्यमंत्री बनाकर उसने अपनी लंबी होती लाइन को भविष्य में और लंबी करने के संकेत दे दिए। साफ दिख रहा है कि भाजपा अब नई लीडरशिप खड़ी करने के मूड में है, ताकि भविष्य में वह अपने बूते सरकार बनाने में सक्षम हो सके। इस बार 74 सीटें आने से उसके हौसले बढ़े हुए हैं। हालांकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की बैठक में नीतीश कुमार ने इस बार मुख्यमंत्री बनने से मना भी किया था, लेकिन भाजपा ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहती थी कि बाद में उसे उल्टा पड़े। वह नीतीश कुमार को साथ लेकर ही फिलहाल आगे बढ़ना चाहती है।
कांग्रेस की सर्वाधिक फजीहत : चुनाव बाद सबसे ज्यादा फजीहत कांग्रेस पार्टी की हो रही है। पिछली बार कांग्रेस पार्टी 41 में से 27 सीट जीती थी, लिहाजा बेहतर स्ट्राइक रेट रहने के कारण इस बार महागठबंधन में लड़-भिड़कर 70 सीटें उसने ले लीं, लेकिन हाथ आईं केवल 19 सीटें। अब उसके साथी राजद और वामपंथी दल तो हार का ठीकरा उस पर फोड़ ही रहे हैं, उससे ज्यादा हर बार की तरह पार्टी के भीतर भी कलह मच गई है। कोई टिकट वितरण में गड़बड़ी का आरोप लगा रहा है तो कोई केंद्रीय नेतृत्व पर सवाल उठा रहा है। जब हार हुई है तो इसकी जिम्मेदारी भी किसी न किसी को लेनी ही है। इसलिए इस परंपरा का निर्वहन भी शुरू हो गया है। कांग्रेस के बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल और प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा ने इस्तीफा दे दिया है, हालांकि अभी उसे स्वीकारा नहीं गया है। शीर्ष नेतृत्व स्तर से अभी तक हार की समीक्षा को लेकर कोई पहल भी नहीं दिख रही।(UNA)