पुस्तक मेले में लेखकों/ संस्कृति कर्मियों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर गुंडों ने की हमले की कोशिश

0
110

पुस्तक मेले के आखिरी दिन 12 जनवरी को लेखकों/ संस्कृतिकर्मियों ने पुस्तक मेले में अपराह्न 3.30 के आस-पास लोकतंत्र के पक्ष में, सीएए व एनआरसी के विरोध में और जेएनयू पर हमले के खिलाफ प्रदर्शन किया। हाथों में स्लोगन की तख्तियां लिए लेखकों/ संस्कृतिकर्मियों के एक समूह ने पुस्तक मेले में हॉल नम्बर 12 के पास प्रदर्शन शुरू किया। अस्मिता थिएटर के कलाकारों ने क्रांतिकारी गीतों के जरिये अपनी बात रखनी शुरू ही की थी कि उपस्थित भीड़ से कुछ लोगो ने बदहवास भारत माता की जय चिल्लाना शुरू किया। धीरे-धीरे भीड़ में अराजक तत्व बढ़े और मोदी-मोदी के नारे लगाने लगे। व ‘गोली मारों सालों को’ जैसे नारे देने लगे।

इधर संस्कृति कर्मियों ने एक से बढ़कर एक क्रांतिकारी और देशभक्ति के गीत गाये। यह दृश्य एक असमान मुकाबले में बदल गया। एक ओर साक्षात पशु-पुच्छ विषाण हीन थे तो दूसरी ओर कला-प्रवीण सांस्कृतिकर्मी। आलम यह कि जब लेखकों और संस्कृतिकर्मियों ने जन-गण-मन गाना शुरू किया तो भी गुंडे मोदी-मोदी चिल्लाते रहे। गालियां देते रहें। यह देश को प्रेम करने वाले और उद्दंड राष्ट्रवाद के पैरोकारों के बीच का द्वंद था।

और जैसा कि होता रहा है। इस बीच पुलिस आ गयी। कलाकारों-साहित्यकारों ने महिला-कलाकारों की अगुआई में जहां गुंडों को पीछे हटाने में सफलता पायी थी, पुलिस के आते ही वे और उत्साहित होकर कलाकारों की ओर बढ़े। पुलिस ने भी अपने चिर-परिचित अंदाज में शांतिपूर्ण गीत गा रहे कलाकारों के बीच से 5 को डिटेन कर लिया। बाद में तिलक ब्रिज थाने से उन्हें छोड़ा गया।

इस बीच अस्मिता थिएटर के निदेशक/ संचालक नाट्यकर्मी अरविंद गौड़ की स्थितिप्रज्ञता काबिल-ए-तारीफ थे। उन्होंने खुद तो पुलिस और गिरफ्तार कलाकारों के मसले को हल करना उचित समझा वहीं यह भी सुनिश्चित किया कि शो जारी रहे।

उन्होंने तय कार्यक्रम के अनुरूप हमें इशारा किया कि आप हॉल की ओर बढ़ें। हमारी योजना थी कि हम लेखक मंच से संविधान की प्रस्तावना पढेंगे। हम पहले से तय थे कि मंच पर चाहे जिसका भी कार्यक्रम हो, हम वहां जाकर प्रस्तावना पढ़ेंगे। लोगों ने कहा कि अच्छा है कि इस वक्त मंच पर कई परिचित साहित्यकार आसीन हैं सुविधा होगी। लेकिन हमें जैसा कि उम्मीद थी साहित्यकारों के पैनल में इस मुद्दे पर मतभेद दिखा। किसी मंचासीन साहित्यकार ने प्रस्तावना पढ़नी भी चाही (जाहिर है उनकी प्रतिबद्धता उसे ऐसा करने को प्रेरित कर सकी) तो अधिकांश ने उससे असहमति जता दी। उम्मीद के अनुरूप एनबीटी की ओर से मंच का प्रबंधक तो ऐसी कोई प्रस्तावना पढ़ने देने वाला नहीं था। यद्यपि हमने कहा कि भाई सरकार भी संविधान का 70 साल मना रही है-लेकिन उसपर न प्रभाव पड़ना था और न पड़ा।

तब हमने वरिष्ठ साहित्यकार सुशीला टाकभौरे के नेतृत्व में मंच के नीचे ही संविधान की प्रस्तावना पढ़ी। साथ में रहीं नीलिमा चौहान, पुष्पा विवेक, नीतिशा खलखो, शालिनी श्रीनेट और थे राजेश चन्द्र, नवल किशोर कुमार,संजीव चंदन आदि।

इसके पूर्व हॉल 12 के पास प्रदर्शनकारियों में इनमें से कई तो थे ही, अस्मिता थिएटर की टीम के अतिरिक्त आम आदमी पार्टी के विधायक और पंकज पुष्कर सहित कई लोग शामिल हुए। हालांकि कुछ साहित्यकार इस प्रदर्शन से बचते भी दिखे।