बच्चों के दिल की देखभाल: अब जागरूक होने का समय

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UNA NEWS
DELHI BUREAU,

डॉ मुर्तजा कमाल

डॉ मुर्तजा कमल, एमबीबीएस, एमडी (बाल रोग), डीएनबी (बाल रोग), डीएनबी (पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी)
सलाहकार बाल चिकित्सा कार्डियोलॉजी, एस्टर रमेश अस्पताल, विजयवाड़ा, भारत।

डॉ वीरेंद्र यादव

डॉ वीरेंद्र यादव, एमबीबीएस, एमडी (बाल रोग),एसोशिएट प्रोफेसर, रामा मेडिकल कॉलेज, हापुड़ उ.प्र.
डॉ वीरेंद्र किड्ज़ क्लिनिक, गौर सिटी -2, ग्रेटर नोएडा।

फरवरी माह को जन्मजात हृदय रोग (सीएचडी) जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है और 7-14 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय सीएचडी सप्ताह के रूप में मनाया जा रहा है। भारत अपनी 1.3 अरब की आबादी के साथ, दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले देश के रूप में दूसरे स्थान पर है। भारत ने सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपना स्थान बनाया है। दुनिया भर में हर साल लगभग 2.5 मिलियन बच्चे पैदा होते हैं, इनमें से कई नवजात, जन्म से ही जन्मजात दोषों से ग्रस्त होते हैं। इन जन्मजात दोषों में, जन्मजात हृदय रोग (सीएचडी) सबसे आम है जो तकरीबन 28-30% तक पाया जाता है। सीएचडी की व्यापकता इसी बात से समझी जा सकती है कि यह जन्म लेने वाले प्रत्येक 1000 बच्चों मे से 8-10 बच्चों को हो सकता है। हमारे देश में हर साल लगभग 2.4 लाख बच्चे सीएचडी की बीमारी के साथ पैदा होते हैं। यद्यपि विश्व स्तर पर सीएचडी के साथ जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या कमोबेश स्थिर है, वस्तुतः सीएचडी का महामारी विज्ञान हमारे देश में पश्चिमी दुनिया की तुलना में काफी अलग है।
85% मामलों में, सीएचडी की बीमारी का कारण अज्ञात है। केवल 10-15% मामलों में आनुवंशिकता की भूमिका पाई जाती है। रूबेला जैसे मातृ वायरल का नवजात शिशुओं में सीएचडी की उपस्थिति के साथ घनिष्ठ संबंध पाया गया है। यदि माता को मधुमेह है या वह धूम्रपान या शराब का सेवन करती है तो भी नवजात को सीएचडी होने की संभावना बढ़ जाती है। गर्भावस्था की पहली तिमाही के दौरान, विशेष रूप से टेराटोजेनिक दवाओं का सेवन, गर्भवती महिला का अनानुपातिक बीएमआई , माता-पिता की बढ़ती उम्र, सगोत्रीय विवाह, इन-विट्रो फर्टीलाईजेशन तकनीक से गर्भाधन वे अन्य कारण हैं जिन्हें इस सूची में शामिल किया जा सकता है। पारिवारिक इतिहास में पहले से किसी को सीएचडी होना भी होनेवाले बच्चे मेें सीएचडी की समस्या पाए जाने के जोखिम को बढ़ाता है।
1995 के बाद सीएचडी के मामले समय के साथ बढे है। यह मुख्य रूप से बेहतर नैदानिक ​​तौर-तरीकों के कारण हुआ है जो अब जन्मजात हृदय रोगों की जांच के लिए आसानी से उपलब्ध हो गए हैं। एशियाई देशों में उच्च सगोत्रीय विवाह दर के कारण, दुनिया के इस हिस्से में या बीमारी अधिक पाई जा रही है। गंभीर सीएचडी जिसमें शैशवावस्था में तुरंत इलाज की आवश्यकता होती है, प्रति 1000 बच्चों मे 1.5-1.7 तक हो सकती है। उच्च आय वाले देशों में जहाँ कम जन्म दर और सीएचडी के तुरंत इलाज की उच्च सफलता दर है उन देशों में सीएचडी का प्रसार वयस्कों एवं बच्चों में समान है। जबकि भारत में सीएचडी से प्रभावित बच्चों में वयस्क होने तक जीवित बचे रहने की दर बहुत कम है। केवल 10-15% बच्चों को ही हमारे यहाँ सही समय पर तुरंत इलाज मिल पाता है। नई दिल्ली के एक सार्वजनिक अस्पताल में किए गए एक अध्ययन में या पाया गया कि केवल 14% वयस्कों की हृदय संबंधी सर्जरी हुई थी।
एम्स, नई दिल्ली की प्रख्यात बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रोफेसर अनीता सक्सेना के द्वारा हाल ही में एक अनुसंधान पेपर में, या बताया गया कि क्रमशः उत्तरी, दक्षिणी और उत्तर पूर्वी भारत में लगभग 14000, 6500 और 1500 नवजात शिशु गंभीर सीएचडी की समस्या के साथ पैदा होते हैं और जिन्हें जन्म के पहले वर्ष में तुरंत इलाज की आवश्यकता होती है, किंतु उनमें से क्रमशः केवल 17%, 72% और 0% को ही हमारे देश में इसके लिए उपयुक्त पारंपरिक उपचार मिल पाता है। यह देखभाल के स्तर के बीच भारी असमानता को दर्शाता है जो एक ही देश के विभिन्न क्षेत्रों में शिशुओं को उपलब्ध है।
निवारण हमेशा इलाज से बेहतर है। सीएचडी की रोकथाम मुश्किल है क्योंकि ज्यादातर मामलों में इसका कारण अज्ञात होता है। महिलाओं को शिक्षित करने और महिलाओं के सशक्तिकरण से इस क्षेत्र में मदद मिलेगी। ज्ञात जोखिम कारकों से बचने के लिए माता-पिता की काउंसलिंग की जानी चाहिए।
भारत में सालाना लगभग 40,000 बच्चे जन्मजात रूबेला के साथ पैदा होते हैं और यह वैश्विक दर का एक तिहाई है। स्कूली बच्चों का टीकाकरण इस बीमारी को रोकेगा और गर्भावस्था के दौरान मातृ रूबेला के मामलों को कम करेगा। रूबेला के खिलाफ टीकाकरण हमारे देश के टीकाकरण कार्यक्रम की सूची में पहले ही शामिल किया जा चुका है।
भोजन में फोलिक एसिड की खुराक ने कनाडा के 2 अध्ययनों में सीएचडी की कमी पर प्रभाव दिखाया है। फोलिक एसिड का फोर्टीफिकेशन और सप्लीमेंट एक अन्य रणनीति है जिसका उपयोग हमारे देश में सीएचडी के जन्म के प्रसार को कम करने के लिए किया जा सकता है और किया भी जा रहा है।
मातृ मधुमेह और उच्च रक्तचाप का उचित और पर्याप्त नियंत्रण और शराब के सेवन के साथ गर्भवती महिला के द्वारा सक्रिय और निष्क्रिय धूम्रपान से बचना निश्चित रूप से सीएचडी को कम करने में भूमिका निभाएगा। इस संदर्भ में टेराटोजेनिक दवाओं के उपयोग से बचने की जरूरत है। सीएचडी वाले बच्चे के माता-पिता और रिश्तेदारों की उचित आनुवंशिक परामर्श की आवश्यकता होती है और उन्हें आगे के गर्भधारण से जुड़े जोखिमों के बारे में सूचित किया जाना चाहिए।
सीएचडी की जांच के लिए फीटल इको एक उपयोगी उपकरण है। यह आमतौर पर गर्भावस्था के लगभग 18-20 सप्ताह के गर्भ में किया जाता है। हमारे देश में एमटीपी अधिनियम के अनुसार 20 सप्ताह से अधिक के भ्रूण को गिराना गैरकानूनी है।
दुनिया भर में सालाना सीएचडी की समस्या के साथ सालाना पैदा होने वाले लगभग 1.35 मिलियन बच्चों में से 90% गैर-समृद्ध देशों में पैदा होते हैं और इसलिए ज्यादातर को पर्याप्त उपचार नहीं मिलता है। सीएचडी के निदान और उपचार के लिए विशेष सुविधाओं और प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों की आवश्यकता होती है। उच्च आय वाले देशों में सीएचडी की समस्या के साथ पैदा हुए बच्चों का जल्दी पता चल जाता है और उनका समय पर इलाज हो जाता है। दूसरी ओर, निम्न और मध्यम आय वाले देशों में, जो की अधिक घनी आबादी वाले और उच्च जन्म दर वाले हैं में सीएचडी के अधिक मामले सामने आते हैं और इसलिए सुविधाओं और सामर्थ्य की कमी के कारण यह एक बड़ी समस्या बन जाती है।

विकासशील देशों में 90% शिशुओं के लिए उन्नत हृदय देखभाल व्यावहारिक रूप से अनुपलब्ध है। विकासशील और विकसित देशों के बीच उपलब्ध स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं के बीच भारी असमानता है। उत्तरी अमेरिका में 1 हृदय केंद्र 0.12 मिलियन की आबादी के लिए उपलब्ध है जबकि एशिया में यह उपलब्धता 16 मिलियन की आबादी के लिए मात्र 1हृदय केंद्र है। उत्तरी अमेरिका में एक कार्डियक सर्जन 3.56 मिलियन की आबादी के लिए उपलब्ध है जबकि एशिया में यह उपलब्धता 25 मिलियन की आबादी के लिए मात्र 1 है। वर्तमान में हमारे देश में सिर्फ 130 हृदय बाल रोग विशेषज्ञ हैं।
हमारे देश में सालाना सीएचडी के साथ पैदा होने वाले 2.4 लाख बच्चों में से लगभग एक को जीवित रहने के लिए शैशवावस्था में ही प्रारंभिक चिकित्सा की आवश्यकता होती है। पिछले एक दशक में हमारे देश में बहुत सारे हृदय केंद्र सामने आए हैं लेकिन अभी भी यह संख्या लगभग 60 तक ही सीमित है। हमारे देश में संसाधन न केवल अपर्याप्त हैं बल्कि उनका वितरण भी असमान है। शेष भारत की तुलना में दक्षिणी राज्यों में चिकित्सा के अधिक केंद्र हैं। देश के पूर्वी और मध्य भागों में व्यावहारिक रूप से किफायती उपचार तक उपलब्ध नहीं है।
हमारी समस्याएं कभी न खत्म होने वाली हैं। स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं की कमी, अक्षम और अपर्याप्त बुनियादी ढांचा तथा प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी के साथ-साथ तेजी से जनसंख्या वृद्धि कभी न खत्म होने वाली समस्याएं हैं। हमारे देश में सीएचडी का पता प्रसव पूर्व बहुत कम मामलों में लग पाता है। कई बीमा कंपनियां सीएचडी के इलाज की लागत को कवर नहीं करती हैं। इलाज कराने की लागत भी हमारी अधिकांश आबादी वहन नहीं कर सकती। मूल रूप से हृदय संबंधी रोगों से ग्रस्त बच्चे के जीवन को बचाने के लिए माता-पिता को पर्याप्त समृद्ध होना आवश्यक है। अधिकांश माता-पिता, बेहद हताशा में, इलाज ना करवाने का विकल्प ही चुनते हैं, और अगले बच्चे पर अपना दांव लगाते हैं (जो उम्मीद है कि सामान्य होगा)। कड़वी सच्चाई यह है कि एक बच्चा जो जन्मजात जन्म दोष के साथ पैदा हुआ है, हमारे तथाकथित आधुनिक समाज में अवांछित अतिथि है। समाज का बहुत कम अर्थात लगभग 1% भी इन समस्याओं से प्रभावित नहीं होता है, इसलिए अपने देश में इस समस्या की ओर अब भी किसी का ध्यान नहीं जाता है।
कुछ राज्यों में सीएचडी के उपचार में सहयोग करने के लिए विभिन्न सरकारी योजनाएं हैं। जिन सरकारी योजनाओं के तहत निजी अस्पताल उपचार करते हैं, उनमें सरकारी योजनाओं के तहत केवल आंशिक भुगतान किया जाता है, और वह भी समय पर नहीं। अधिक जटिल मामलों में पूरे खर्च को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि यह आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं होती हैं। धार्मिक, सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाएं, बीमारी के जटिल हो जाने के उपरांत चिकित्सा सहायता मांगना और उपचार में लिंग के प्रति पूर्वाग्रह इस समस्या के अन्य पहलू हैं।
80% तक जन्मजात हृदय रोगों में, एक बार के चिकित्सा हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है। सीएचडी के केवल पांच मे से एक मामले में ही दोबारा सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है। इस तथ्य पर ध्यान देने की आवश्यकता है और सीएचडी के पूर्वानुमान के प्रति समाज के व्यवहार और दृष्टिकोण में परिवर्तन की आवश्यकता है। यह निश्चित रूप से नही कहा जा सकता कि जिन सीएचडी से ग्रस्त बच्चों का इलाज नहीं हो पाएगा उन सभी की मृत्यु हो जाएगी। यदि उनमें से कुछ बच्चे जीवित रह जाते हैं तो वे या तो विकलांग हो जाते है या अक्षम और इसलिए वे न केवल आर्थिक रूप से बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से भी परिवार और समाज पर बोझ बन जाएंगे।
इसलिए, हमें इन सीमित संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने की आवश्यकता है ताकि अधिक से अधिक बच्चे लाभान्वित हो सकें। एक ही मॉडल सभी पर फिट बैठे यह जरूरी तो नहीं। हमें रूबेला और फोलिक एसिड फोर्टिफिकेशन के लिए बड़े पैमाने पर टीकाकरण शुरू करने की जरूरत है। समय की मांग है कि बच्चों की भलाई के लिए व्यापक स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाया जाए, जो इस लक्ष्य को पूरा कर सके।
प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सकों को संवेदनशील बनाने के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण दिए जाने की आवश्यकता है। भारत में उन्नत सीएचडी देखभाल की उपलब्धता के बारे में लोगों को जागरूक किया जाना चाहिए। डिस्चार्ज के समय नवजात शिशुओं की पल्स ऑक्सीमेट्री से स्क्रीनिंग शुरू कर देनी चाहिए। सरकारी सहयोग के साथ और अधिक केन्द्रों की स्थापना की आवश्यकता है। जागरूकता बढ़ाने के लिए नियमित अंतराल पर वयस्क हृदय कार्यक्रमों के साथ साथ बाल चिकित्सा हृदय कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए।
हमारे देश की जनसंख्या बहुत अधिक है और संसाधन सीमित है, इसलिए, यह हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है। उनमें से कई का निदान और उपचार नहीं किया जा रहा है। हमें वास्तव में अपने देश में सीएचडी से ग्रस्त बच्चों की देखभाल में एक लंबा सफर तय करने की जरूरत है। याद रखें कि एक समाज का मूल्यांकन इस बात से किया जाता है कि वह अपने सबसे कमजोर और सबसे रक्षाहीन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

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