बिहार के निवासियों को झारखंड में किसी प्रकार का आरक्षण नहीं मिलेगा

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पिछले वर्ष 18 अक्टूबर को हाईकोर्ट में हुई थी। सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। झारखंड हाइकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एचसी मिश्र, अपरेश कुमार सिंह तथा बीबी मंगलमूर्ति की खंडपीठ ने फैसला सुरक्षित रखा था।

रांची: झारखंड हाई कोर्ट का आरक्षण पर बड़ा फैसला आया है। पिछले वर्ष 18 अक्टूबर को हाईकोर्ट में हुई थी।सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया था।झारखंड हाइकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एचसी मिश्र, अपरेश कुमार सिंह तथा बीबी मंगलमूर्ति की खंडपीठ ने फैसला सुरक्षित रखा था।बिहारियों को झारखंड प्रदेश में किसी प्रकार का कोई आरक्षण नहीं मिलेगा।

झारखंड होईकोर्ट ने आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार, राज्य में अब बिहारियों को किसी भी प्रकार का आरक्षण नहीं दिया जाएगा। हाईकोर्ट की उच्च पीठ के दो जजों ने इस संबंध में सोमवार को अपना फैसला सुनाया। फैसले के अनुसार, यह व्यवस्था बिहार के सभी मूल निवासियों पर लागू होगी। हालांकि, फैसला सुनाने वाले हाईकोर्ट के इस उच्च पीठ के एक जज का आदेश बाकि दोनों जजों के आदेश से अलग था।
पीठ के दो न्यायाधीशों ने एक मत से यह फैसला सुनाया, वहीं पीठ का नेतृत्व कर रहे न्यायमूर्ति एचसी मिश्र ने इससे असहमति जताई और कहा कि राज्य बनने से पहले से बिहार से यहां आकर रह रहे लोगों को भी राज्य की सेवा में आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।

इसके बाद न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह ने अपना आदेश पढ़ते हुए सर्वोच्चन्यायालय द्वारा बीर सिंह के मामले में दिए गए आदेश का हवाला दिया और कहाकि एक राज्य का निवासी दूसरे राज्य में आरक्षण का हकदार नहीं होगा। यहीआदेश बीबी मंगलमूर्ति का भी था। इसके बाद दोनों जजों ने प्रार्थियों की अपील को खारिज करते हुए सरकार के पक्ष को सही माना।इससे पूर्व सुनवाई के दौरान पूर्व महाधिवक्ता अजीत कुमार ने पीठ को बतायाथा कि एकीकृत बिहार के समय से अथवा 15 नवंबर 2000 से राज्य में रहने केबाद भी वैसे लोग आरक्षण के हकदार नहीं होंगे जिनका ओरिजिन (मूल) झारखंडनहीं होगा। आरक्षण का लाभ सिर्फ उन्हें ही मिलेगा जो झारखंड के मूल निवासी होंगे। इस मामले में प्रार्थी की ओर से कहा गया था कि एकीकृत बिहार वर्तमान बिहार और वर्तमान झारखंड में उनकी जाति एससी-एसटी व ओबीसी के रूप में शामिल है इसलिए वर्तमान झारखंड में उन्हें एससी-एसटी व ओबीसी के रूप मेंआरक्षण मिलना चाहिए। उनका कहना था कि पिछले कई सालों से वे झारखंड क्षेत्र में रह रहे हैं और सिर्फ इसलिए उन्हें आरक्षण के लाभ से वंचितनहीं किया जा सकता है कि वो वर्तमान में बिहार राज्य के स्थाई निवासीहैं। उन्होंने न्यायालय को बताया कि संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में जोअधिकार मिला हुआ है। उसके अनुसार उन्हें आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए।इस मामले में वादी पंकज यादव की झारखंड में सिपाही के रूप में बहाली हुईथी। इस दौरान बिहार के स्थाई निवासियों ने आरक्षण का लाभ लिया था। बादमें मामला उजागर होने पर उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। इसके बादपंकज कुमार ने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की। एकलपीठ ने सरकार केफैसले खारिज करते हुए उन्हें बहाल करने का निर्देश दिया। इसके बाद सरकारने खंडपीठ में अपील की।एक दूसरे मामले में रंजीत कुमार सहित सात अभ्यर्थियों ने पुलिस में बहालीआरक्षण का लाभ नहीं मिलने पर उच्च न्यायालय की शरण ली थी। एकलपीठ नेसरकार के फैसले को सही ठहराते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इन्होंनेभी खंडपीठ में अपील दाखिल की थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनोंमामलों को खंडपीठ ने एक साथ टैग करते हुए 9 अगस्त 2018 को तीन न्यायाधीशों की पीठ को सुनवाई के लिए भेजने की अनुशंसा की थी। इसके बादबड़ी पीठ में मामले की सुनवाई हुई।
इस पीठ में न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह और न्यायमूर्ति बीबी मंगलमूर्ति भी थे। सबसे पहले, पीठ का नेतृत्व कर रहे न्यायमूर्ति एचसी मिश्र ने अपना आदेश पढ़कर सुनाया। उन्होंने अपने आदेश में कहा कि प्रार्थी एकीकृत बिहार के समय से ही झारखंड क्षेत्र में रह रहा है, इसलिए उसे आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।

उन्होंने यह कहते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया और प्रार्थियों को नौकरी में बहाल करने का आदेश दिया।इसके बाद न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह ने अपना आदेश पढ़ते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बीर सिंह के मामले में दिए गए आदेश का हवाला दिया और कहा कि एक राज्य का निवासी दूसरे राज्य में आरक्षण का हकदार नहीं होगा। यही आदेश बीबी मंगलमूर्ति का भी था। इसके बाद दोनों जजों ने प्रार्थियों की अपील को खारिज करते हुए सरकार के पक्ष को सही माना।

याचिकाकर्ता ने ये दलील थी कि एकीकृत बिहार, वर्तमान बिहार और मौजूदा झारखंड में उनकी जाति अनुसूचित जाति एवं पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के रूप में शामिल है। इसलिए वर्तमान झारखंड में उन्हें एससी और ओबीसी के रूप में आरक्षण मिलना चाहिए।

याचिककर्ता ने यह भी दलील थी कि पिछले कई सालों से वह झारखंड क्षेत्र में रह रहे हैं।नये राज्य झारखंड के निर्माण के बाद 15 नवंबर 2000 से वह लगातार झारखंड में हैं।उन्होंने कहा कि सिर्फ इसलिए उन्हें आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता है कि वह बिहार के स्थायी निवासी हैं।सरकार की ओर से इस दलील का विरोध किया गया था और कहा गया था कि झारखंड के स्थायी निवासी को ही राज्य की आरक्षण नीति के तहत लाभ दिया जा सकता है। दूसरे राज्यों के लोगों को उस राज्य की आरक्षण नीति का लाभ सिर्फ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ही दिया जा सकता है.