बिहार में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का 16 फीसद वोट बैंक होने का अनुमान लगाया गया

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Patna: बिहार में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का 16 फीसद वोट बैंक होने का अनुमान लगाया जाता है। विधानसभा चुनाव में जीत की गारंटी दे रहे इस वोट बैंक को हथियाने के लिए राजनीतिक दल तरह-तरह के उपाय में जुटे हैं। कई नए-पुराने दलित नेता सक्रिय हैं। हलचल तेज है। खासतौर पर स्वयं को इस वर्ग का नेता घोषित कर चुके नेताओं में भी होड़ मची है। मुख्यधारा की सभी पार्टियां इसी रणनीति में कुछ चेहरे को आगे कर रहीं हैं।
वोट बैंक को अपने पाले में करने की होड़ कभी बिहार में दलितों के 16 फीसद वोट बैंक पर राजद अपने कब्जे का दावा करता था। नीतीश कुमार के हाथ में सत्ता आई तो अत्यंत पिछड़ी जातियों के अलावा दलितों के सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक उत्थान के लिए कई योजनाएं शुरू की गईं। यह वर्ग जदयू से जुड़ता चला गया। जदयू एनडीए में रहा, तो इसका लाभ इस गठबंधन को मिला। 2020 के चुनाव के पहले इसी वोट बैंक पर ‘असली दखल’ साबित करने की होड़ मची है। लोजपा और हम जैसी पार्टियां इस खेल में ज्यादा सक्रिय हैं।
चुनावी मौसम में हितैषी होने का स्वांग- महागठबंधन भी दलित वोटों पर नजर गड़ाए हुए है। दलित लेखक एवं चिंतक डॉ. दिलीप राम बताते हैं कि चुनाव में इस वोट बैंक को हासिल करने की जुगत हर राजनीतिक दल करता है। कुछ यूं कहिए कि यह वोट ‘हॉट केक’  की तरह है। वोट बटोरने के बाद इन्हें सुख-सुविधा और सम्मान देने की सुधि किसी को नहीं रहती। केवल चुनावी मौसम में राजनीतिक पार्टियां हितैषी होने का स्वांग रचती हैं। बिहार में अनुसूचित जाति के कुल मतदाताओं में 70 फीसद रविदास, मुसहर और पासवान हैं। यानी चुनाव में एक प्रभावी वोट बैंक। इसी वोट के लालच में दावे-वादे और जाने क्या कुछ नहीं होता।
पहले से ज्यादा परिपक्व हुए हैं मतदाता- चुनावी मौसम में एनडीए और महागठबंध के स्तर से जीत के समीकरण के लिए हाशिये की इस दलित आबादी को साधने की हर कोई जुगत कर रहा है। रामविलास पासवान, चिराग पासवान, जीतन राम मांझी, बाबू जगजीवन राम की पुत्री डॉ. मीरा कुमार, श्‍याम रजक जैसे प्रमुख नेता चुनाव के दौरान इस वोट बैंक को साधने की कोशिश करते हैं। राजनीतिक चिंतक डॉ. एके सिंह कहते हैं कि समय के साथ अनुसूचित जाति से संबंधित राजनीति के कोण भी बदलते रहे हैं। इस बार के चुनाव में यह तबका जीत-हार की दिशा तय करेगा। अनुसूचित जाति के मतदाता भी पहले से ज्यादा परिपक्व हुए हैं और वे अपना असली शुभचिंतक पहचानने में गलती नहीं करेंगे।(UNA)