बेइंतहां दर्द और मजबूरियों की दास्ताँ है सीवर कर्मचारियों का जीवन.

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19 अक्टूबर 2019,नई दिल्ली

UNA/दिल्ली ब्यूरो

सीवर कर्मचारियों के हालात को जानने के लिए एक जनसुनवाई का कार्यक्रम दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान में DASM (दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच) और सहयोगी संस्थाओं ने आयोजित किया. दिल्ली और आसपास के इलाकों में जारी सीवर में मौतों और घायलों के कुछ मामलों की जनसुनवाई के दौरान पूरा माहौल बहुत ग़मगीन हो गया था. स्वच्छ भारत अभियान की जो चकाचौंध निर्मित की गयी है, ठीक उसके नीचे, इस स्वछता को अंजाम देनें वालों की अंधकारमय जीवन, अनिश्चितता, लाचारी और रोजीरोटी का संकट दिख रहा था. किसी का पति, किसी का बेटा, किसी का बाप बजबजाती सुरंग में मौत का जो दुश्चक्र चल रहा है, उसमें पूरा का पूरा सिस्टम दोषी है.

ढेरों कानूनी प्रावधानों, नियमों, सुप्रीम कोर्ट के फटकारों के बावजूद सीवर में मौतों को सिलसिला जारी है. बहुत हाय-तौबा की वजह से मरने वालों के परिजनों को कुछ मुवावजा तो मिल जाता है लेकिन घायलों को और उनके सेहत की जटिलताओं के लिए कोई सहायता नहीं मिलती है और ऐसे लोग दवा और इलाज़ के अभाव में तिलतिल कर मरते रहते हैं. पीड़ित परिवारों के पुनर्वास या नई आजीविका के लिए भी प्रावधान हैं लेकिन रिपोर्ट यह बताता है कि प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक चुप्पी की वजह से यह पुनर्वास कार्यक्रम फाइलों तक ही सिमटा हुआ है.

त्रिलोकपुरी निवासी (अब मेरठ में) अशोक कुमार की विधवा मिथिलेश बताती हैं कि 2013 में उनके पति इंदिरागांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में सीवर में काम करते हुए मारे गए थे. मिथिलेश को उस समय एक लाख रुपये मुवाजे में मिला था लेकिन चार बच्चों की माँ मिथिलेश को उनके बच्चों के शिक्षा, स्थाई नौकरी और पुनर्वास के लिए एक भी पैसा नहीं मिला, उन्हें मज़बूरन वापस अपने पुस्तैनी घर जाना पड़ा, आजतक उन्हें एक पैसे की भी मदद नहीं मिली. वह और मिथिलेश के नाबालिग बच्चे मज़दूरी कर के अपना जीवन पाल रहे हैं.

इस तरह के कई मामले सुनवाई के दौरान देखने को मिले. इस जन सुनवाई के मुख्य आयोजक संजीव डांडा ने बताया कि उत्तरी दिल्ली में सीवर सफाई के दौरान कई लोग मारे गए थे, उसमे से एक कर्मचारी बच तो गए थे लेकिन बाद में बहुत सी बीमारियों को झेल रहे परिवार के सहयोग के लिए किसी भी तरह की सरकारी या गैर सरकारी मदद नहीं मिली. बाद में हमलोगों ने दोस्तों से सहयोग लेकर उनका इलाज़ करवाया. हालांकि अभी भी उनके परिवार को तत्काल मदद की जरूरत है. ऐसे सैकड़ों मामलों को हम लोग फिर से उठा रहे हैं और पूरी न्याय दिलाने की कोशिश करेंगे. DASAM की कार्यकारी प्रबंधक सुश्री ऐना ने बताया कि सफाई कर्मचारियों और सीवर कर्मचारियों की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति बहुत दयनीय है और आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा होना भी सरकारी और सामाजिक उपेक्षा और आपराधिक चुप्पी मुख्य कारण है.

जन-सुनवाई के ट्रिब्यूनल में श्री एच पी मिश्र, (सेंटर फॉर सोशल डेवलपमेंट), श्री संतलाल चावरिया ( राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष), श्री दुनु रॉय (पर्यावरण और सामाजिक खतरों के विशेषज्ञ), हेमलता कंसोटिया (सीवर कर्मचारियों के अधिकारों के लिए काम करने वाली प्रमुख कार्यकर्ता), डॉ नीलम (दलित कार्यकर्ता और प्रोफेसर दिल्ली विश्वविद्यालय) सुश्री श्रीदेवी (अधिवक्ता), सुश्री नाबिला हसन (HRLN के साथ जुडी हुईं अधिवक्ता) थे.