ब्लैक फंगस मचा रहा तबाही : इन राज्यों में मिले सबसे ज्यादा मरीज, डॉक्टरों को दवा के संकट का डर

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महाराष्ट्र; सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, महाराष्ट्र में ब्लैक फंगस के सबसे अधिक मरीज मिले हैं। यहां दो हजार मरीजों में ब्लैक फंगस मिला है, जबकि 90 मरीजों की मौत हो चुकी है।
देश में ब्लैक फंगस (म्यूकॉरमायकोसिस) तबाही मचा रहा है। खासतौर पर महाराष्ट्र, गुजरात और मध्यप्रदेश में ब्लैक फंगस तेजी से पैर पसार रहा है। इसी तरह गुजरात में 1163 मामले सामने आए हैं और 61 मरीजों की मौत हो चुकी है। तमिलनाडु, ओडिशा , गुजरात, चंडीगढ़  राजस्थान और तेलंगाना ने ब्लैक फंगस को महामारी घोषित किया है।
इन राज्यों में सबसे कम केस राज्यों के आंकड़ों के अनुसार बिहार में ब्लैक फंगस के 103 केस मिले हैं और दो मौत हुई है। छत्तीसगढ़ में 101 मरीजों में म्यूकॉरमायकोसिस की पुष्टि हुई है और एक मरीज की जान गई है। तेलंगाना में 90 मरीज मिले हैं , दस की मौत हुई है। कर्नाटक में भी ब्लैक फंगस के 97 मरीज हैं , यहां कोई मौत नहीं हुई है।
यूपी-हरियाणा में अब तक 8-8 की मौत मध्य प्रदेश में ब्लैक फंगस के कुल 575 केस आए हैं और सरकारी आंकड़ों के अनुसार 31 मरीजों ने दम तोड़ दिया है। उत्तर प्रदेश में 169 लोगों में ब्लैक फंगस मिला है और आठ मौतों की पुष्टि हुई है। दिल्ली में 203 मरीज मिले हैं और एक की मौत हुई है। हरियाणा में 268 मरीज मिले हैं आठ मरीजों ने दम तोड़ दिया है।
महाराष्ट्र में इंजेक्शन की किल्लत
महाराष्ट्र के स्वास्थ्यमंत्री राजेश टोपे ने बताया है कि महाराष्ट्र में 1500 से अधिक मरीज मिले हैं जिसमें अभी 850 मरीजों का इलाज चल रहा है। उन्होंने बताया कि एक मरीज को औसतन 60 से 100 इंजेक्शन लग सकते हैं। ऐसे में औसतन डेढ़ लाख इंजेक्शन की जरूरत पड़ सकती है। समय रहते गंभीर मरीजों को इंजेक्शन नहीं मिलने से बीमारी और गंभीर होती है जिससे जान पर खतरा बन सकता है। 
दवा के संकट को लेकर डॉक्टर भयभीत 
दिल्ली के निजी अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि वो कोरोना मरीजों का इलाज तो कर रहे हैं लेकिन पर दवा के लिए सरकार से आवेदन करना पड़ रहा है । ऐसे में दवा मिलने में समय लग रहा है जिससे मरीजों की स्थिति तेजी से बिगड़ रही है। 
डॉक्टरों को डर है कि ऑक्सीजन और रेमडेसिविर इंजेक्शन की तरह ब्लैक फंगस की दवा का संकट हो सकता है। तब मरीजों की जान बचाना मुश्किल होगा। दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. डीएस राणा का कहना है कि सरकारी अनुमति से दवा की आपूर्ति बेहतर है, पर मरीजों की संख्या बढ़ने से व्यवस्था डगमगा सकती है।