भारत की जनता को दिए गए वचनों के प्रति सरकारों की उदासीनता:विनय ओहदार

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हैदराबाद,26 जनवरी। आज बिहार में रहने वाले सामाजिक वैज्ञानिक विनय ओहदार ने 71वां गणतंत्र दिवस हैदराबाद में मनाया। इसके बाद भारतीय संविधान के 70 वें जन्मदिन का उत्सव हैदराबाद में रेनबो होम के बच्चों के साथ मनाया। रेनबो होम में ऐसे बच्चे हैं जो संविधान द्वारा भारत की जनता को दिए गए वचनों  के प्रति सरकारों की उदासीनता के जीते जागते उदहारण हैं। 70 वर्ष के बाद भी, देश में मौजूद अन्याय एवं  गैरबराबरी  के  सताये गए माता पिता के या माता/पिता विहीन गलियों में असहनीय यातना सहने वाले इन बच्चों के लिए शायद संविधान में पिरोये इन शाब्दों को समझना सबसे आवशयक है।

देश के सभी रेनबो होम में संविधान की प्रस्तवना का पाठ करने और उसका असली मतलब समझने का कार्यक्रम रखा गया। बच्चों को खास कर प्रस्तावना में उद्धृत चार मुख्य शब्दों न्याय(Justice), समानता(Equality), स्वतंत्रता(Liberty) एवं बंधुता ( fraternity) का  अर्थ  समझने पर जोर दिया। असल में देश में जो  समस्याएं है वो मूलतःआम जनता के इन शब्दों के अर्थ न समझ पाने और शासकों में संविधानिक नैतिकता ( constitutional morality) के घोर आभाव के नतीजे हैं. आज समय के साथ इस अनैतिकता में कमी नहीं हुई है बल्कि बढ़ी है और कहें की आज वो चरम सीमा पर पहुंची हुई है। वास्तविकता तो यह है संविधान के जन्म के साथ ही समाज एवं  राज्य को चलाने  वाले  कुलीन  तबके ने  संविधान की आत्मा , justice, equality,  liberty और fraternity पर आक्रमण करना आरम्भ  कर दिया था और कुलीन शासकों की कभी खुली  तो कही मौन सहमति हमेशा रही, और वो तबका जिसके लिए इन शब्दों को संविधान में ये शब्द पिरोया गया था हमेशा ठगा -ठगा सा देखता  रहा और अब तो  उस  तबके  से भी लोग उनके साथ  शामिल हो गए हैं ।

पहली घटना घटी 1951 में जब  मद्रास हाई कोर्ट में  वहां की सरकार द्वारा सरकारी नौकरी में दिये गए आरक्षण को चुनौती दी गयी।कहा  ये गया कि कोई भी आरक्षण अनुच्छेद 16(2 ) में  दिए  गए समानता के अधिकार का उलंघन है। मजेदार बात ये की मद्रास हाई कोर्ट ने चुनौती देनेवालों के पक्ष में judgement दे दिया। क्योंकि फैसला देने वालों के भी हित के लिए  था। और इस जजमेंट ने संविधान में पहले संशोधन को जन्म दिया। वास्तव में  Equality का ये अधिकार equality among equals की बात नहीं करता बल्कि equality among unequal की बात  करता है। पर ऐसा भी नहीं  की इतनी मोटी  से बात न्याय के भगवानों  की समझ में  नहीं आयी होगी, पर वे  जिनका प्रतिनिधितव करते है उनके हितों की रक्षा लिए संविधान में इंटरप्रेटेशन की असीम सम्भावनाये हैं।

दूसरी घटना अपने बिहार/झारखंड  की थी जिसने एक और संविधान संशोधन को जन्म दिया।  बिहार में १९५१ में ज़मीदारी उन्मूलन कानून लाया गया। कानून ने  सभी ज़ामीदरों/बिचौलियों( Intermediaries) का उन्मूलन का उपाय कर  दिया और  सर्कार ज़मीन का मालिक हो गयी। ज़मीदार जो वास्तव में बिचौलिए थे और अपने को ज़मीन का मालिक  समझ  बैठे थे , हाई कोर्ट चले गए और कहा की यह सम्पति के अधिकार, अनुच्छेद 31 का उलन्घन है। मजेदार बात ये की हाई कोर्ट ने ज़मीदारों के पक्ष में फैसला दिया और ज़मीदारी उन्मूलन कानून को गैरसंवैधानिक बता दिया। सब जानते हैं  उस समय वकील और जज कौन हुआ करते थे। शुक्र है सुप्रीम कोर्ट का कि उसने पटना हाई कोर्ट के जजमेंट को निरस्त कर दिया। कम से कम उस समय के शासको में इतनी नैतिकता थी की उन्होंने सम्पति के अधिकार को ही मौलिक अधिकार से हटा दिया।

किन्तु दिन ब दिन ये नैतिकता घटते जा रही है। आज जब अनुच्छेद 14, 15, 16, 19 की व्याख्या टीवी के महारथियों सुनता हूँ तो लगता है की पिछले 70 वर्षों ने सरकारों ने जान बुझ कर जनता को जनता अनपढ़ रखा ताकि जनता इनके अर्थ नहीं समझ सके और शासकों की अनैतिकता निर्बाध जारी रहे।

आलोक कुमार