यूएपीए: ‘खौफनाक कानून’ के इस्तेमाल में टॉप पर है प्रदेश, योगी और भाजपा को लग सकता है तगड़ा झटका

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देश में ‘खौफनाक कानून’ कहे जाने वाले ‘गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम’ यानी यूएपीए का उत्तर प्रदेश में जमकर इस्तेमाल हो रहा है। हालांकि विपक्षी दल ‘इस्तेमाल’ की जगह ‘दुरुपयोग’ शब्द का प्रयोग करते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सत्ता संभालने के बाद तो एकाएक इस कानून के तहत दर्ज होने वाले मामलों में तेजी आ गई। नए और पुराने केसों की गति में सत्तर फीसदी से ज्यादा का अंतर हो गया। 
जम्मू कश्मीर और उत्तर पूर्व के राज्य भी उत्तर प्रदेश से पीछे छूट गए। साल 2017 में यूएपीए के तहत यूपी में 109 मामले दर्ज हुए थे, जिनमें 382 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। अगले साल यानी 2018 में 107 केसों में 479 लोग और 2019 में दर्ज हुए 81 मामलों में 498 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। विपक्षी दलों का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा, दोनों को इस कानून का दुरुपयोग अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में तगड़ा झटका दे सकता है। 
मामले कम व गिरफ्तारी ज्यादा, इस ट्रेंड में यूपी अव्वल है
यूएपीए के तहत दर्ज मामले की जांच, राज्य पुलिस और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा की जाती है। जहां तक एनआईए का संबंध है, आतंकवाद से जुड़े मामलों के त्वरित विचारण यानी ट्रायल के लिए अब पूरे देश में अब तक 48 विशेष अदालतों का गठन किया गया है। अगर यूपी की ही बात करें तो 2015 में महज छह केस दर्ज किए गए थे। इनमें 23 व्यक्ति गिरफ्तार हुए। इससे अगले साल यानी 2016 में 10 केस दर्ज हुए, जिनमें 15 लोग गिरफ्तार किए गए। साल 2017 में 109 केस दर्ज हुए, जिनमें 382 लोगों को पकड़ कर जेल में डाल दिया गया। 
इसके अगले वर्ष यानी 2018 में 479 और 2019 में 498 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। यूपी में चार वर्षों के दौरान यूएपीए के 313 केस दर्ज हुए हैं। इनमें 1397 लोगों को गिरफ्तार किया गया। असम में 2015 के दौरान 103 केस में 128 गिरफ्तारी, 2016 में 216 मामलों में 219 गिरफ्तार, 2017 में 133 केसों में 374 गिरफ्तार, 2018 के 308 केसों में 170 गिरफ्तार और 2019 में 87 केसों के तहत 112 लोग गिरफ्तार किए गए। जम्मू कश्मीर में यूएपीए के अंतर्गत 2015 से लेकर 2019 तक 876 केस दर्ज हुए थे। इनमें 505 लोगों की गिरफ्तारी हुई। 
झारखंड में यूएपीए के तहत चार वर्षों के दौरान 415 केसों में 516 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। तमिलनाडु में चार वर्ष में 278 केस दर्ज थे। इनमें 328 लोगों की गिरफ्तारी हुई। मणिपुर में इस अवधि के दौरान यूएपीए के तहत 1796 केस दर्ज किए गए, जिनमें 2158 लोगों को पकड़कर जेल में डाल दिया गया। केरल में 145 मामले दर्ज हुए हैं। इनमें 85 लोगों की गिरफ्तारी हुई है। इसी तरह बिहार में चार वर्ष के दौरान 203 केस दर्ज किए गए, जिनमें 567 लोगों को गिरफ्तार किया गया। 
5922 में से केवल 132 व्यक्तियों पर दोष साबित हुआ
वर्ष 2019 की एनसीआरबी रिपोर्ट के मुताबिक, यूएपीए के तहत एक साल में गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों की कुल संख्या 1948 है। इस कानून के अंतर्गत साल 2016 से लेकर 2019 तक 5922 गिरफ्तार किए गए थे। खास बात है कि इनमें से केवल 132 व्यक्तियों पर दोष साबित हो सका। इससे पता चलता है कि यूएपीए का दुरुपयोग हो रहा है। यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), विक्रम सिंह ने इस मामले में कहा है कि यूएपीए एक बहुत ही संवेदनशील कानून है। इसे बहुत ही सावधानी के साथ लागू किया जाना चाहिए। इस कानून का किसी भी तरह का दुरुपयोग, बहुत गंभीर परिणाम दे सकता है। कानून का दुरुपयोग इसकी पवित्रता को कम करने के लिए काफी है। इस कानून के तहत सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार करने के लिए एक अनिवार्य कारण होना चाहिए। पूर्व आईपीएस वीएन सिंह भी कह चुके हैं कि ऐसे कठोर कानून का नियमित आधार पर इस्तेमाल ठीक नहीं है। इससे दुरुपयोग की संभावना बनी रहती है। यूएपीए का इस्तेमाल बहुत ही दुर्लभ मामलों में किया जाना चाहिए। यूपी में इसके नियमित इस्तेमाल से कानून व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ है। बेगुनाह लोगों पर यूएपीए लगाना गलत है।