राजस्थान कांग्रेस में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व सचिन पायलट खेमे के बीच चल रही खींचतान को खत्म करने के लिए बनाई गई तीन सदस्यीय कमेटी, मंगलवार को दिल्ली स्थित कांग्रेस वार रूम में पहली बैठक

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राजस्थान कांग्रेस में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व सचिन पायलट खेमे के बीच चल रही खींचतान को खत्म करने के लिए बनाई गई तीन सदस्यीय कमेटी की मंगलवार को दिल्ली स्थित कांग्रेस वार रूम में पहली बैठक हुई। बैठक में कमेटी के सदस्य अहमद पटेल, संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल व राजस्थान प्रभारी महासचिव अजय माकन मौजूद रहे। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निर्देश पर यह कमेटी गठित की गई थी। कांग्रेस आलाकमान ने कमेटी को निर्देश दिए थे कि राजस्थान कांग्रेस के विवाद को जल्द से जल्द सुलझा लिया जाए। इसी को देखते हुए कमेटी ने अपनी पहली औपचारिक बैठक ले ली। कमेटी का मुख्य फोकस राजस्थान में दोनों खेमों के बीच संतुलन बनाकर चलना और यहां के हालातों को सामान्य करना है। अब अजय माकन इसी सप्ताह राजस्थान के दौरे पर आएंगे और विधायकों से मिलकर उनका फीडबैक लेंगे।
उठापटक शांत, बड़ा सवाल ये कि विस्तार के लिए सरकार काे किसका है इंतजार- प्रदेश में एक महीने से ज्यादा समय तक चला सियासी उठापटक शांत अब शांत हाे चुका है। सरकार ने विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर लिया। अब उसे काम करना है। लेकिन मंत्रिमंडल के पोर्टफोलियो में अभी 10 सीटें खाली हैं। जानकारों की मानें तो 32 दिनों तक चली बाड़ाबंदी में सीएम अशोक गहलोत इसकी सारी एक्सरसाइज कर चुके हैं। प्रदेश के नए प्रभारी अजय माकन इन 32 दिनों तक बाड़ाबंदी में गहलोत व अन्य विधायकों के साथ ही रहे हैं। इसलिए अब सियासी हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि सरकार को किस बात का इंतजार है। गहलोत के नजदीकी लोगों की मानें तो फिलहाल मंत्रिमंडल विस्तार की कोई जल्दबाजी नहीं दिख रही है। सूत्रों का कहना है जब तक रिशफलिंग टाली जा सकती है तब तक टाली जाएगी क्योंकि सरकार को अभी इसमें कोई फायदा नजर नहीं आ रहा। एक दूसरी वजह यह भी है कि आलाकमान ने प्रदेश के सियासी विवाद को निपटाने के लिए जो तीन सदस्यीय कमेटी गठित की है उसे भी अपना काम करना है। कमेटी का काम खत्म होने के बाद ही मंत्रिमंडल विस्तार की कोई संभावना नजर आ रही है। भले ही गहलोत के समर्थक सचिन पायलट व अन्य 18 बागी विधायकों को सरकार और संगठन में शामिल नहीं करने को लेकर अड़े हैं, लेकिन ऐसा पूरी तरह से संभव नहीं है। पायलट के समर्थकों को मंत्रिमंडल और संगठन में शामिल करना भी सरकार की सियासी मजबूरी होगी। पायलट गुट की ओर से आने वाले दिनाें में केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव बनाया जा सकता हैं, जिससे उनके गुट के विधायकाें काे कैबिनेट में शामिल किया जाए।(UNA)

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