राम राज्य की कल्पना

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अयोध्या में भूमि-पूजन एक तरह से बीजेपी और आरएसएस की राम राज्य की कल्पना का साकार होना है. इसका जश्न भव्य है तो ये स्वाभाविक ही है. जिस विचारधारा की सरकार है, वह अपने सपने के साकार होने का जश्न क्यों न मनाए? ऐतिहासिकता में देखें तो राम राज्य की अवधारणा को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं. इस लेख में ये देखने की कोशिश होगी कि मोहनदास करमचंद गांधी और डॉ. बी.आर. आंबेडकर की नज़रों में राम और राम राज्य क्या था.

गांधी का राम राज्य यानी जादूगर का बक्सा
भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के शिखर नेता गांधी की हमेशा ये कामना थी कि भारत में राम राज्य आए. लेकिन राम राज्य की कोई परिभाषा वे कभी नहीं दे पाए. बल्कि उन्होंने जानबूझकर इसे अबूझ पहेली बनाए रखा. उनके राम राज्य में सत्ता का विकेंद्रीकरण, स्वशासन, बुनियादी शिक्षा, ग्राम स्वराज जैसे अलग-अलग तत्व हैं. कभी उन्होंने कहा कि ये ऐसा राज होगा जहां सबसे अमीर और सबसे गरीब व्यक्ति के अधिकार समान होंगे. तो 1929 में यंग इंडिया अखबार में वे लिखते हैं कि राम राज्य की अवधारणा का मतलब एक ऐसा लोकतंत्र है, जिसमें मामूली से मामूली नागरिक को तेजी से और बिना ढेर सारा धन खर्च किए न्याय मिल जाएगा. आगे चलकर जब देश में सांप्रदायिकता बढ़ती है तो वे कहते हैं कि राम राज्य का मतलब हिंदू राष्ट्र नहीं है. ईश्वर अलग-अलग लोगों के लिए राम और रहीम किसी भी शक्ल में हो सकता है.

ये राम राज्य के बारे में कही गई उनकी सैकड़ों बातों में से कुछ नमूने हैं. जाहिर है कि सुविधा के हिसाब से और सुनने वालों के हिसाब से गांधी राम राज्य के बारे में कुछ-कुछ बोलते चले गए. सवाल उठता है कि अब जबकि अयोध्या में राम मंदिर के लिए भूमि-पूजन और मंदिर निर्माण हो रहा है, तो इस समय में गांधी की वैचारिक भूमि उन्हें कहां खड़ी करती?

गांधी का अयोध्या ज्यादा आना-जाना नहीं था. ज्ञात जानकारियों के आधार पर लेखकों ने बताया है कि वे दो बार ही अयोध्या गए. इसमें से एक दौरे में सरयू तट पर सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि ‘कमजोर की रक्षा करना बहुत जरूरी है. इसके बिना हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम ईश्वर से अपनी सुरक्षा के लिए प्रार्थना करें.’ इसी भाषण में वे आगे कहते हैं कि ‘हमें वैसे प्रेम करना सीखना होगा, जैसा प्रेम राम ने सीता से किया था.’