वनाधिकार पट्टों के वितरण मामले में मध्य प्रदेश के सी.एम. पर उठे सवाल वनाधिकार पट्टों के संबंध में देना होगा जवाब

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मध्य प्रदेश में लाखों वनवासियों को उनके वनाधिकार पट्टों के निरस्त होने के बावजूद उन्हें राज्य सरकार द्वारा पट्टों के वितरण का आदेश दिया गया है। इस मामले को लेकर प्रदेश में बड़ा विवाद खड़ा होता दिखाई दे रहा है।
प्रदेश में 3 लाख 58 हजार 339 वनवासियों के वनाधिकार पट्टों को निरस्त कर दिया गया है। इसके बावजूद हाल ही में मुख्यमंत्री शिवराजसिंग चौहान ने कलेक्टर और डीएफओ को इन सभी प्रकरणों का एक साप्ताह में पुनरीक्षण कर वनवासियों को हर हाल में पट्टा देने का निर्देश जारी किया है। इस संबंध में हुई बैठक के निर्णय की जानकारी उन्होंने खुद अपने ट्विटर अकाउंट से दी थी। आदिवासी अंचलो में पंचायतें आयोजित कर आदिवासियों को वनाधिकार पट्टा वितरण करने का यह आदेश माननीय उच्चतम न्यायालय के अदेशों और वनाधिकार कानून 2006 का उल्लंघन माना जा रहा है। ऐसे ही एक प्रकरण में माननीय उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र के वनमंत्री को जेल भेजा था। वनाधिकार पट्टों के इस प्रकरण की गंभीरता  को देखते हुए महाराष्ट्र के पुराने प्रकरण की याद ताजा हो गई है।
इस संदर्भ में जानकारी यह है कि वनाधिकार कानून 2006 के अंतर्गत विभिन्न राज्यो में वनजमीन पर धड़ल्ले से अतिक्रमण चल रहा है। मध्य प्रदेश में इस प्रकार के अतिक्रमण अपने चरम पर है। इस संदर्भ में एक याचिका वाइल्डलाइफ फर्स्ट एवं अन्य बनाम भारत सरकार और अन्य में लंबे समय से सुनवाई चल रही है। या ऊपर का वाक्य ले लें।इस याचिकाकर्ता के वकील जाने-माने वकील पी.के. मनोहर हैं। उन्होंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के इस ट्वीट और प्रदेश के अखबारों मे जंगलों में हो रहे अतिक्रमणों की खबरों को गंभीरता से लेते हुए 4 जुलाई को एक ज्ञापन लिखा था। इसमें नेपानगर के घाघरला के जंगलो में हुई अवैध कटाई, जुलाई 2019 के बाद से अतिक्रमण में आई तेजी और वनविभाग के अधिकारीयों पर इस संदर्भ में हुए हमलों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। वनाधिकार पट्टों के निरस्त होने के बावजूद कलेक्टर और डीएफओ को मुख्यमंत्री की ओर से से आदेश दिया जाना गैर-कानूनी है। साथ ही, इससे वनाधिकार कानून 2006 और उसके तहत बने नियमों का उल्लंघन बताया गया है। ज्ञापन में कहा गया है कि ऐसा करने से प्रदेश में वनजमीन पर जबरन अतिक्रमण करने वाले गिरोह और माफिया सक्रिय हो जाते हैं और उससे वनों की रक्षा में जुटे वन विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारियों का मनोबल गिरता है।
माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा 28 फरवरी 2019 को दिए गए आदेश में वनाधिकार कानून 2006 के तहत जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा निरस्त किए गए दावों का पुनरीक्षण करने को बिल्कुल नहीं कहा गया है। माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश में सभी राज्य सरकारों को इन दावों के निरस्त होने का कारण बताने एवं वनाधिकार कानून में दिए गए प्रावधान का पालन किया गया है या नहीं, पूछा गया है। इस आदेश में कहीं भी निरस्त किए गए दावों को फिर से जांच करने या पुनरीक्षण करने को नहीं कहा गया है। इस कानून की धारा 6 के अनुसार जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति के निर्णय को अंतिम माना गया है। ऐसा इस ज्ञापन में लिखा है।
ज्ञापन में आगे यह भी लिखा है कि वनाधिकार कानून 2006 की धारा 11 (1) के तहत कोई भी ग्रामसभा या ग्राम स्तर की समिति यह प्रक्रिया शुरू करने के केवल 3 महीने के अंदर ही दावों को स्वीकार कर सकती है। अगर यह अवधि बढ़ानी है तो हर ऐसे दावे के कारण स्पष्ट रूप से लिखना जरूरी है। ऐसे में इन समितियों द्वारा दावों को स्वीकार करना भी गैर-कानूनी है। ज्ञापन में वकील मनोहर ने रिट पिटिशन 109 /2008 (वाइल्डलाइफ फर्स्ट एवं अन्य विरुद्ध भारत सरकार और अन्य) के तहत दाखिल अर्जी क्रमांक 130305/2019 की ओर मुख्यमंत्री का ध्यान आकर्षित कर प्रदेश के जंगलों में चल रहे अतिक्रमणों पर तुरंत रोक लगाने का आग्रह किया है। इस कानून के तहत जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा लिए गए निर्णय को बदलने का आदेश राज्य की कोई भी संस्था नहीं दे सकती एवं ग्राम समितियों को ऐसे दावे दाखिल करने के लिए दी गई 90 दिन की समय सीमा का पालन न करना गैर-कानूनी होगा। यह ज्ञापन में स्पष्ट किया गया है। इस विषय में अब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री क्या जवाब देते हैं, यह आने वाला समय बतायेगा।

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