किसानों को मृदा में कार्बनिक पदार्थ पोषक तत्वों के स्तर में  करें सुधार

  • कृषि विकास प्रयोगाशाला में सांगोद क्षेत्र में फसल अवशेष प्रबंधन पर सघन अभियान जारी
  • फसल अवशेष प्रबंधन पद्धति को अपनाएं किसान

खाद्यान पूर्ति हेतु अधिक फसल उत्पादन के साथ ही अधिक फसल अवशेष भी पैदा हो रहें जिनका प्रबंधन करना अत्यंत आवश्यक है। किसानों द्वारा खेती में कम्बाईन मशीनों के निरंतर बढ़ते उपयोग की वजह से खेतों मे बहुत अधिक मात्रा में फसल अवशेष पड़ा रहता है, जिनको किसान खेत का कचरा समझ कर जला देतें है। फसल अवशेषों को जलानें से मृदा स्वास्थ्य, मानव स्वास्थ्य एंव पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव देखनें को मिल रहें है। अतः अब आवश्यकता इस बात की है कि हम ऐसे प्रभावी तथा मृदा व पर्यावरण संरक्षण करने वाली फसल अवशेष प्रबंधन पद्धति को अपनाना होगा। जिनसे फसल उत्पादकता लाभ दीर्घकाल तक टिकाऊ साबित हो। इसी बात को ध्यान में रखते हुए चम्बल फर्टिलाईजर्स की कृषि विकास प्रयोगशाला द्वारा इस माह सांगोद क्षेत्र में फसल अवशेष प्रबंधन पर सघन अभियान चलाया जा रहा है। फसल अवशेष प्रबंधन पर कृषक संगोष्ठियों का आयोजन खजुरी, बम्बुलिया और बरखेड़ी गांवों में किया गया।

कृषि विकास प्रयोगशाला के उप प्रबंधक डॉ. जगमोहन सैनी ने बताया इस अभियान के अंर्तगत प्रतिदिन 3 से 4 गांवों में कम्पनी के अधिकारीयों द्वारा दौरा करके किसान भाईयों को खेतों में फसल अवशेषों को मिला कर जैविक खाद के रुप में काम लेने तथा फसल अवशेषों को अन्य उद्योगों जैसे बायोचार, बायोएनर्जी, बायोफ्यूल, कागज व पल्प बोर्ड, मशरूम उत्पादन तथा ईट भट्टों आदि में बेच कर आर्थिक लाभ कमाने की सलाह दी जा रही है। खेतों में फसल अवशेष को मिलाने के लियें सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम, हैप्पी सीडर, जीरो टील डील, धान स्ट्रॉ चॉपर, मोल्डबोर्ड प्लो, श्रेड मल्चर, श्रब मास्टर एंव रोटरी स्लेशर आदि कृषि यंत्रों पर सरकार द्वारा अनुदान भी प्रदान किया जा रहा है। डॉ. सैनी ने बताया फसल अवशेषों को जलाने से हृदय और फेफडे़ से जुड़ी बीमारियां, बच्चों मे अस्थमा, दमा जैसी श्वांस बीमारीयां, आंख, नाक व गलें में जलन, चर्म रोग आदि होते है। फसल अवशेषों को जलाने से उत्पन धुएं से पशुओं की आंख में जलन, अस्थायी अंधापन एवं श्वांस की बीमारीयां होती है। पशु के स्वास्थ्य में गिरावट होने से उसकी दूध उत्पादन क्षमता में भी कमी आती है। फसल अवशेषों को जलानें से ग्रीन हाउस गैसें का उत्सर्जन होता है जिसके कारण वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी, समुद्र तटों का विस्तार, धुर्वो के किनारों का पिघलना इत्यादि जलवायुवी परिवर्तन होते है।

डॉ. सैनी ने बताया की धान के एक टन फसल अवशेष खेत में मिलाने से 5.5 किलो नत्रजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस, 25 किलो पोटाश व 1.2 किलो सल्फर, कुछ मात्रा में सुक्ष्म पोषक तत्व भूमि को प्राप्त होते है। इस प्रकार अवशेषों कें खेत में मिलाकर 2000 रुपये की प्रति हेक्टेयर फसल उत्पादन लागत को कम कर सकते है। अभियान के दौरान किसानों को फसल अवशेषों को खेत में मिलाने से होने वाले विभिन्न फायदों जैसे – मृदा सुक्ष्मजीवों की संख्या में वृद्धि, मृदा में कार्बनिक पदार्थ व पोषक तत्वों के स्तर में सुधार, मृदा जल संरक्षण, मृदा जल धारण क्षमता व जल उपयोग क्षमता में वृद्धि, मृदा क्षरण में कमी एंव समस्याग्रस्त मृदाओं में सुधार, खरपतवार की संख्या में कमी, तथा कम फसल लागत में अधिक उत्पादनए पर्यावरण का संरक्षण, आदी के बारें मे समझाया जा रहा है। खेत में फसल अवशेषों को सड़ाने के लिये किसान भाई फसल कटाई के 5 से 7 दिन बाद वेस्ट डीकम्पोजर का घोल या 20 किलो प्रति एकड़ यूरिया उर्वरक को खेत में फैले हुए फसल अवशेषों के ऊपर छिड़कनें के साथ रिवर्सिबल मोल्डबोर्ड प्लो हल को चलाकर अवशेषों को मिट्टी के निचे दबा देते है। इस प्रकार 25-35 दिन में खेत में कम्पोस्ट खाद तैयार हो जाती है। बायोकम्पोस्ट बनाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान केन्द्र द्वारा पूसा कम्पोस्ट टीका, राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र गाजियाबाद द्वारा वेस्ट डीकम्पोजर (कचरा अपघटक) आदि उत्पाद विकसित किये है, जिनके द्वारा फसल अवशेषों को खेत में एकत्रित कर सड़ाकर थोड़े ही समय में अच्छी बायोकम्पोस्ट खाद बनायी जा सकती है।