सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार सुधा भारद्वाज की रिहाई कल संभव

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सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज की रिहाई का मार्ग प्रशस्त हो गया है। 1 दिसंबर को बॉम्बे हाइ कोर्ट ने डिफ़ाल्ट जमानत दे दी थी। लेकिन सुधा भारद्वाज की रिहाई नहीं होने देने के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने इस जमानत को खारिज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। आज इस मामले की सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय के जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस बेला त्रिवेदी की पीठ ने बॉम्बे हाई कोर्ट के जमानत देने के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि हमें हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता। और एनआईए की याचिका को खारिज कर दिया। यह आदेश पारित करते हुए उच्चतम न्यायालय ने भीमा कोरेगांव केस में सुधा भारद्वाज को बाम्बे हाईकोर्ट द्वारा मिली डिफॉल्ट जमानत के आदेश को बरकरार रखा।अब सुधा भारद्वाज के जमानत पर रिहा होने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

1 जनवरी 2018 को भीमा कोरे गाँव में यलगार परिषद का आयोजन इसके 200 साल पूरे होने के उपलक्ष में मनाया गया था। इस आयोजन में देश विदेश से लाखों लोग पहुंचे थे। उस समय वहाँ जुलूस पर विरोधियों ने सुनियोजित हमला कर दिया था। उस हमले के पीछे के मास्टरमाइंड सांभा जी भिड़े का नाम उछला था, और एकतरफा कार्रवाई करते हुए भीमा कोरेगाँव के इस कार्यक्रम के आयोजकों और प्रतिभागियों को ही सुनियोजित ढंग से यूएपीए के तहत जेलों में डाला जाने लगा। जिसमें सुधा भारद्वाज को भी तींन साल से जायदा समय से जेल में रखा गया। इनके अलावे लेखक और वैज्ञानिक आनंद तेलतुमड़े, गौतम नौलखा, वरवर राव आदि नाम प्रमुख हैं। इसी मामले में आदिवासी हितों के लिए काम करने वाले स्टैन स्वामी को भी गिरफ्तार किया गया था और उनकी कोरोना के कारण जेल में ही मौत हो गई थी। इस मामले ने विश्व भर में भारतीय सत्ता और प्रशासन की बहुत बदनामी भी हुई थी।

अब देखना है कि असली गुनहगार कब तक बाहर रहेंगे और बेगुनाओं को कब न्याय मिलेगा।