स्वमीप्रसाद मौर्य ने आखिर क्यों थामा सपा का दामन

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संपादकीय
विधान सभा चुनाव का बिगुल जब सभी पार्टियों ने फूँक दिया है, तभी अचानक भाजपा से स्वमीप्रसाद मौर्य बाहर निकल जाते हैं। इसे केवल पार्टी टिकट बंटवारे को लेकर स्वामी प्रसाद की नाराजगी तक सीमित कर बताया जा रहा है। यह कुछ हद तक सच भी साबित हो सकती है लेकिन जिस ब्राह्मणवादी हिंदुत्व की राह पर भाजपा और आरएसएस चल रहे हैं, उसमें श्रमण जातियों से आये हुए नेताओं और प्रतिनिधियों को बस पियादे से ज्यादा हैसियत मिलने से रही। सत्ता और संसाधन की लालच तथा भ्रम का तिलिस्म अंततः टूटता ही है। यही वजह है कि सबसे पहले ओमप्रकाश राजभर ने भाजपा का दामन झटका, उसके बाद ओबीसी के कद्दावर नेता स्वमीप्रसाद मौर्य ने ऐन चुनाव के मौके पर अपना दामन भाजपा से छुड़ा लिया है। इसे जिस हिंदुत्व के रासायनिक व सोशल इंजीनियरिंग के दरकने के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि अभी इस तरह के कयास लगाना जल्दबाजी होगी, लेकिन ओबीसी और अति पिछड़ों, अति दलितों का जो भाजपा प्रेम पांच साल पहले उमड़ा था, उसका अवसान होता दिख रहा है।
स्वमी प्रसाद के आने से समाजवादी पार्टी आज एक और मजबूत फ्रंट खोलने में कामयाब दिख रही है।

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