फ़साना-ए-दीवार

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courtesy, Cartoonist Satish Acharya
courtesy, Cartoonist Satish Acharya

जिनके दीदार के लिए पूरा का पूरा सरकारी अमला हलकान है, जिनके दीदार के लिए मोदी एंड कंपनी बेसब्र हुई जा रही है, जिनके दीदार के लिए संघ परिवार अपलक पंथ निहार रहा है, आखिर क्या वजह है कि उन्हीं को कुछ चीजों को दीदार करने से रोका जा रहा है? कुछ तो है जिसकी परदादारी है की तर्ज़ पर ऐसी कोशिशें हो रही हैं कि किसी तरह से परदा टिका रहे, भले ही उनके निकलते ही दीवार परदों की तरह हिलने क्यों ना लगे. आज के इस सोशल मीडिया के दौर में, सेटेलाइट से जब चप्पे-चप्पे पर नज़र है, ड्रोन कैमरे और बेसुमार खुफिया तंत्र है तब इस दौरे-सियासत में मेहमान-ए-खुसीसी को कुछ चीजों से दीदार करने से क्यों रोकना चाहते हैं नरेंद्र दामोदर भाई मोदी? यह बहुत नाइंसाफी है अपने मेहमान के प्रति.

मेहमान-ए-खुसीसी डोनाल्ड भाई ट्रम्प, जी हाँ जब अमरीकी राष्ट्रपति सीधे अहमदाबाद पधार रहे हैं, जहां 70 लाख लोग उनके स्वागत में दण्डवत होंगे, तब उनका नाम डोनाल्ड भाई ट्रम्प कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा. लेकिन सवाल तो यही बनता है कि जो ट्रम्प खुद खुले हुए हैं और काफी खुलकर खेलते हैं तो इतनी क्या मज़बूरियां हैं कि पर्दादारियाँ हैं? जितना दीवार बनाने का खर्चा है, और उसपर रंग रोगन का खर्चा अलग से, तो उससे कम खर्च में ही जिसे छुपाना चाह रहे हैं उसे छुपाने की नौबत नहीं आती. जिस गुजरात मॉडल को दिखाकर अपना कुनबा गुलज़ार करने वाले मोदी एंड कंपनी यह डर तो नहीं सता रहा कि उनकी नंगई कहीं डोनाल्ड भाई ट्रम्प को दिख ना जाए?

गुजरात मॉडल के तथाकथित चमचमाती तस्वीर की पीछे कितने मासूमों के खून से सने टीले तैयार किये गए वो टीले कहीं दिख ना जाएँ गलती से भी. गुजरात जनसंहारों में हज़ारों सिसकती आवाज़ों को छुपाने की कवायद तो नहीं? कहीं यह डर तो नहीं कि जो ताज़ातरीन दीवार जो खड़ी की जा रही है कहीं वह कमज़ोर न पड़ जाए और मासूमों की असीम पीड़ा को झेल ना पाए?

फैज़ अहमद फैज़ दिलकश हुस्न के बावजूद जिस ओर ध्यान आकर्षित करना चाहते थे उसकी कुछ पंक्तियाँ आज के हालात पर बहुत मौजूं हैं-

“अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़ाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे
मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग। ”

हिम्मत सिंह