Bhopal वैसे तो वर्ष 2020 पूरी दुनिया के लिए सबसे बुरे दौर में से एक है, लेकिन इसमें भी बहुतों को खट्टे अनुभव हुए तो कुछ को मीठे स्वाद भी मिले। कोरोना संकट की गूंज अभी भी बरकरार है।

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Bhopal वैसे तो वर्ष 2020 पूरी दुनिया के लिए सबसे बुरे दौर में से एक है, लेकिन इसमें भी बहुतों को खट्टे अनुभव हुए तो कुछ को मीठे स्वाद भी मिले। कोरोना संकट की गूंज अभी भी बरकरार है। उद्योग धंधों के साथ बाजार-व्यापार को मंदी की मार सहनी पड़ी, तो सरकारों एवं राजनीतिक दलों के लिए भी यह साल कई चुनौतियां लेकर आया। बात मध्य प्रदेश की करें तो कोरोना संकट के साथ भाजपा के सितारे बुलंदी पर लौटे तो कांग्रेस के लिए बुरे दौर की शुरुआत हुई। बड़ी मुश्किल से 2018 में राज्य की सत्ता में लौटी कांग्रेस ने एक झटके में न सिर्फ अपनी सरकार गवां दी, बल्कि उपचुनाव में अपना जनाधार भी खो दिया।
कांग्रेस को कर्नाटक के बाद सबसे बड़ा झटका मध्य प्रदेश में ही लगा, जब मार्च महीने में कमल नाथ की सरकार अपने ही विधायकों के विद्रोह के कारण भरभराकर गिर गई। दरअसल पार्टी पर पकड़ बनाए रखने के लिए प्रदेश के नेताओं की लड़ाई में आंख मूंदे रहे नेतृत्व को अहसास ही नहीं हुआ कि उसके पैर के नीचे से जमीन खिसक रही है। मुख्यमंत्री कमल नाथ और दिग्विजय सिंह से वर्चस्व की लड़ाई के कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने के साथ ही कांग्रेस के लिए खराब दिनों की शुरुआत हो गई। उसने न सिर्फ सत्ता गंवाई, बल्कि 28 सीटों के उपचुनाव में भी करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। कांग्रेस सरकार के पतन के बाद सत्ता में लौटी भाजपा अपने प्रबंधन, नेतृत्व क्षमता और संगठन शक्ति के बल मजबूत होती गई।
सरकार गंवाने के बाद कांग्रेस को उम्मीद थी कि इस्तीफा देकर भाजपा के पाले में गए उसके विधायकों की रिक्त सीटों पर जब उपचुनाव होंगे तो वह जीत का परचम फहरा देगी। जब उपचुनाव हुए तो यह खयाली पुलाव साबित हुआ। पार्टी में नेता तो बहुत हैं, लेकिन मोर्चे पर अकेले कमल नाथ लड़ते दिखे। इसका संदेश आम जन में यही गया कि उपचुनाव में भी कांग्रेस एकजुट नहीं है। आपसी लड़ाई और संवादहीनता के कारण जमीनी स्तर पर कांग्रेस इस तरह कमजोर हुई कि 28 में से उसे मात्र नौ सीटें ही मिल सकीं। इस तरह उसी की सीटों पर अपने विधायक जिताकर भाजपा ने सरकार पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। इसमें शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व कौशल की एक बार फिर परख हो गई।
उपचुनाव में हार के बाद कांग्रेस का संकट बढ़ता ही जा रहा है। पार्टी अभी तक तय नहीं कर पाई है कि हार के लिए वास्तव में कौन जिम्मेदार है। संगठन जिम्मेदारी लेने से बच रहा है। सब आपस में एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ रहे हैं। श्योपुर के विधायक ने एक बैठक में हार के लिए कमल नाथ को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। उनका तर्क था, उपचुनाव के दौरान कमल नाथ ऐसा व्यवहार कर रहे थे, जैसे अकेले वह सभी सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों को जिता देंगे। उन्होंने दिग्विजय सिंह जैसे बड़े नेता को नजरंदाज किया। इसका कांग्रेस के प्रदर्शन पर बुरा असर पड़ा। हालांकि जब विवाद बढ़ा तो विधायक ने यह कहकर मामला शांत करने की कोशिश की कि कमल नाथ व दिग्विजय सिंह दोनों ही बड़े नेता हैं। उनकी बात को गलत ढंग से समझा गया। विधायक की सफाई के बावजूद कमल नाथ खेमा इसे सोची-समझी रणनीति के तहत दिया गया बयान ही मानता है। अपने ऊपर लग रहे आरोपों और हार की समीक्षा के दबाव के बीच कमल नाथ ने पिछले दिनों यह कहकर पार्टी में तहलका मचा दिया कि कांग्रेस अपने प्रतिद्वंद्वी भाजपा से नहीं हारी, बल्कि उसे तो अपनों ने ही हराया। छिंदवाड़ा की सभा में कमल नाथ के बयान ने साफ कर दिया कि ऊपर से ठंडी दिख रही राज्य कांग्रेस के अंदर माहौल तनावपूर्ण है। वैसे तो लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को हार मिली थी, लेकिन तब इस तरह के आरोप नहीं लगे थे। ऐसा पहली बार है कि खुद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने ही आरोप लगाया है कि पार्टी को भाजपा ने नहीं, अपनों ने हराया है। हालांकि उपचुनाव के दौरान ग्वालियर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी सुनील शर्मा, भांडेर से फूल सिंह बरैया ने भी शिकायत की थी कि कांग्रेस के कई नेता ही उनका साथ नहीं दे रहे हैं।

सवाल यह है कि आखिर कांग्रेस के अंदर वे कौन चेहरे हैं, जिन्होंने अपने उम्मीदवारों को हराया और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष उनका नाम तक नहीं बता पा रहे हैं। गौरतलब है कि छिंदवाड़ा के अपने दौरे के बाद कमल नाथ सीधे दिल्ली चले गए। वह तभी से दिल्ली में रहे। माना जा रहा है कि वह कांग्रेस नेतृत्व को राज्य में कांग्रेस की हार की वजह जरूर बता चुके होंगे। इस बीच यह चर्चा तेजी से उठी है कि कमल नाथ किसी एक पद से त्यागपत्र देंगे या फिर उन्हें केंद्रीय संगठन में स्थान मिलेगा। उनका स्थान क्या होगा, यह तो बाद में तय होगा, लेकिन इस मुद्दे पर कांग्रेस के अंदर खींचतान मची है। शुक्रवार को पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने यह कहकर चर्चाओं को एक तरह से सही ठहरा दिया कि कमल नाथ प्रदेश के सबसे बड़े नेता हैं। इस बीच 27 दिसंबर को कमल नाथ के आवास पर कांग्रेस विधायक दल की बैठक तो हुई, लेकिन हार के कारणों पर चर्चा नहीं की गई।