मोदी सरकार पर 4,600 करोड़ का दाल घोटाले का आरोप! कांग्रेस ने उठाये सवाल

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केंद्र की मोदी सरकार पर अब 4,600 करोड़ रुपए का दाल घोटाले का आरोप है। इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कई सवाल खड़े किये हैं। अभिषेक मनु सिंघवी ने एक वक्तव्य जारी कर पूछा है कि क्या गरीबों और सेना की दाल में किया काला, 4,600 करोड़ रु. का घोटाला? उन्होंने कहा कि गरीबों और सेना को नाफेड के माध्यम से मोदी सरकार द्वारा दी जाने वाली दाल क्या भीषणतम भ्रष्टाचार से काली की गई है और क्या यह दाल में काला छोटा-मोटा नहीं, लगभग 4,600 करोड़ रु. का है।

क्या टेंडर प्रक्रिया में बदलाव कर किया गया खेल

नेशनल एग्रीकल्चर को-ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के पास जब दालों का बहुत ज्यादा स्टॉक हो गया तब नाफेड ने सरकार से सिफारिश की कि ये दाल देश भर में कल्याणकारी योजनाओं और रक्षा सेवाओं के लाभार्थियों को दी जाएं। मगर नाफेड का दाल का स्टॉक साबुत दलहन के रूप में होता है। उन्हें वितरित करने से पहले दाल बनाने की प्रोसेसिंग के लिए दाल मिलों को दिया जाता है। दाल दलने से लेकर पॉलिश तथा ढुलाई का खर्च केंद्र सरकार उठाती है। इतनी बड़ी मात्रा में इन दालों को बाकायदा नीलामी प्रक्रिया के तहत मिलों को दिया जाता है।

2018 के बाद क्या शुरू हुआ लूट का खेल

2018 के पहले और बाद की नीलामी की प्रक्रिया को आसानी से समझते हैं। 2018 के पहले नीलामी प्रक्रिया इस प्रकार थी कि सरकार अगर 100 किलो चना मिलों को दलने और पॉलिशिंग के लिए देती थी, तो करीब मिल मालिक 70-75 किलो दाल सरकार को लौटाते थे, और इसके एवज़ में वे सरकार से रकम चार्ज करते थे। बाकी नीलामियों की तरह, यहां भी सरकार की कोशिश होती थी कि जो मिल सबसे सस्ते में यह काम करे, उसे ठेका दिया जाता था। नीलामी की इस प्रक्रिया को फ्लोअर रेट या लोअर रेट प्रोसेस के नाम से भी जाना जाता था। यानि जो मिल सबसे कम बोली लगाता, उसे काम दिया जाता था।

क्या 2018 से घोटाले की भूमिका तय की गई

साल 2018 के बाद से नाफेड ने नीलामी प्रक्रिया को भी बिल्कुल बदल दिया। यहां सबसे कम बोली की जगह आउट टर्न रैशो (OTR) सिस्टम, यानि जो मिल चने या अरहर की प्रोसेसिंग के बाद सबसे ज्यादा मात्रा लौटाएगी, उसे ठेका मिलेगा। उदाहरण के लिए, एक क्विंटल चने को दाल में बदलने के लिए अगर तीन दाल मिलें बोली लगा रही हैं, पहली ने कहा कि मैं चने के बदले 70 किलो दाल दूंगी, दूसरी ने 75 किलो और तीसरी ने 80 किलो, ऐसे में सबसे ज्यादा ओटीआर की बोली वाली अर्थात् 80 किलो देने वाली दाल मिल नीलामी जीत जाएगी और उसे काम मिलेगा। लेकिन इस प्रक्रिया ने सरकार को सबसे बड़ा नुकसान यह पहुंचाया कि इसमें कोई लोअर लिमिट नहीं थी। अर्थात् सरकार ने यह बंदिश नहीं लगाई कि न्यूनतम इतने किलो से कम बोली नहीं लगाई जा सकती। सारा खेल इसी प्रक्रिया के बदलाव के तहत किया गया। शर्तें इस प्रकार निर्धारित की जाती थीं कि कुछ बड़ी मिलें ही पार्टिसिपेट कर पाएं और ये बड़ी मिलें आपस में तय करके कम से कम दाल सरकार को लौटाती थीं। और यह गंभीर आरोप लगा कि सरकारी सांठगांठ से दाल मिलों ने कम से कम दाल वापस सरकार को देने के लिए ओटीआर के तहत बोली लगाई और बची हुई दाल खुले बाजार में बेचकर मोटा माल कमाया। एक अनुमान के तहत 2018 के बाद चार सालों में दाल मिलों ने 5.4 लाख टन दालों की प्रोसेसिंग में लगभग 4,600 करोड़ रु. का चूना सरकार को लगाया।

नेशनल प्रोडक्टिविटी काउंसिल का बड़ा खुलासा

बीते दिनों नेशनल प्रोडक्टिविटी काउंसिल, जो कि दाल और अन्य ऑयल सीड्स के प्राईज़ स्टेब्लाईज़ेशन की निगरानी करती है, जो कि भारत सरकार की एक ऑटोनोमस रिसर्च एजेंसी है, ने अपनी प्राथमिक जाँच में पाया कि मोदी सरकार की नाफेड ने अपनी ऑक्शन प्रक्रिया में बदलाव करके उसे इस प्रकार निर्धारित किया कि निजी दाल मिल मालिकों ने सरकार को 4,600 करोड़ रु. का चूना लगा दिया। इतना ही नहीं, 11 अक्टूबर, 2021 को नेशनल प्रोडक्टिविटी काउंसिल ने इस प्रक्रिया को तुरंत बंद करने को कहा था। काउंसिल की इस गंभीर आपत्ति के बावजूद सरकार ने नेशनल एग्रीकल्चर को-ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन (नाफेड) (NAFED) के माध्यम से 137,509 मीट्रिक टन दाल, जो कि 875.47 करोड़ रु. की थी, उसे इसी प्रक्रिया के तहत ऑक्शन किया।

काउंसिल ने अपनी ऑब्ज़र्वेशन और रिकमेंडेशन में यह भी कहा कि चुनिंदा बड़ी मिल मालिकों को फायदा पहुंचाने के लिए जो दाल नीलामी का लॉट साईज़ है, वह 100 मीट्रिक टन रखा है, जिससे छोटी दाल मिल संचालित करने वाले (एमएसएमई यूनिट्स) इस नीलामी प्रक्रिया में भाग ही नहीं ले सकते। काउंसिल ने सिफारिश की कि यह लॉट साईज़ 25 टन किया जाना चाहिए।

जबकि देश में एक अनुमान के अनुसार लगभग 7,000 दाल मिल हैं, जिसमें से अधिसंख्य छोटे स्तर की हैं। यह टेंडर की प्रक्रिया मिल मालिकों को फायदा पहुंचाने के लिए कई बार इतनी अपारदर्शी होती है कि कुछ गिनी चुनी मिलों को लाभ पहुंचाया जा रहा है, यह साफ पता चलता है। उदाहरण के लिए, पिछले साल आर्मी पर्चेज़ ऑर्गेनाईज़ेशन टेंडर में यह कहा गया कि वही मिल मालिक एप्लाई कर सकते हैं, जिन्होंने पहले आर्मी पर्चेज़ ऑर्गेनाईज़ेशन की टेंडर प्रक्रिया में नाफेड के रास्ते भाग लिया हो।

2015 में ही चावल मिल मालिकों के मामले में कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ने इस ओटीआर प्रणाली को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया था और यह बताया था कि कम ओटीआर के चलते मिल मालिक बाकी बचे चावल को अलग से बेचते हैं, जिसके कारण सरकार को 2,000 करोड़ रु. का घाटा हुआ है। कैग इस अनियमितता को इसलिए पकड़ पाया था क्योंकि भारतीय फसल प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी संस्थान ने अपनी रिपोर्ट में दर्शाया था कि चावल की किस्मों का औसतन ओटीआर आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा स्वीकार किए गए ओटीआर से काफी ज्यादा है। इस नीलामी पद्धति को साल 2020 में केंद्रीय सतर्कता आयोग के समक्ष भी लाया गया था, कि इस नीलामी प्रक्रिया से हजारों करोड़ रु. का नुकसान हो रहा है और इसके ऑडिट की मांग की गई थी। लेकिन इस शिकायत पर भी कोई गंभीर कार्रवाई नहीं हुई।

बोली प्रक्रियाओं की इन खामियों का पता तब चला जब कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत वितरित की जा रही दाल की गुणवत्ता को लेकर कई राज्यों ने केंद्र सरकार से घटिया स्तर की दाल को लेकर शिकायत की थी। कुछ राज्यों ने तो इन दालों को लेने से इंकार भी कर दिया था। उन्होंने कहा था क्योंकि ये खाने योग्य ही नहीं हैं, इसलिए हम इन्हें स्वीकार नहीं कर सकते।

सरकार के प्रमुख शोध संस्थान, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नॉलॉजी ने भी नीलामी पर सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें इन प्रक्रियाओं की खामी का उल्लेख किया है। सरकार ने इस रिपोर्ट के आधार पर एक अंतर एजेंसी समिति का गठन करने के लिए भी बाध्य किया।
केंद्र सरकार को यह बता पता थी कि दूसरे कई प्रांतों में ओटीआर के तहत निकाले गए टेंडरों में न्यूनतम सीमा निर्धारित की जाती है। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश राज्य नागरिक आपूर्ति निगम द्वारा चना दाल को प्रोसेस करने के लिए 19 अगस्त, 2020 को एक टेंडर निकाला गया था, जिसमें ओटीआर की न्यूनतम सीमा 70 फीसदी तय की गई थी। यानि कोई भी मिल मालिक इससे कम पर बोली नहीं लगा सकता था।

सेना सेवाओं को दी जाने वाली दाल के गुणवत्ताहीन होने की भी शिकायत आती रही। नाफेड द्वारा पीएसएस समर्थन मूल्य योजना के तहत तय मानकों के आधार पर दालों को स्टॉक करता है, लेकिन कई प्रांतों ने यह शिकायत की कि घटिया दाल की सप्लाई नाफेड द्वारा की जा रही है। पंजाब सरकार ने एक से अधिक बार खराब गुणवत्ता की शिकायत की थी और मई, 2020 में केंद्र को 46 टन दाल वापस लौटा दी थी। अगस्त, 2020 में गुजरात ने केंद्र को सूचित किया था कि चने का 21 फीसदी सैंपल वितरण के लिए अनुपयुक्त है। इतना ही नहीं, गुजरात सरकार ने यह भी सुझाव दिया था कि वितरण प्वाईंट के साथ-साथ मिलिंग प्वाईंट पर भी दाल की गुणवत्ता का परीक्षण किया जाना चाहिए। मगर केंद्र ने वितरण बिंदुओं के साथ मिलिंग बिंदुओं पर दाल की गुणवत्ता का निरीक्षण करने का प्रस्ताव खारिज कर दिया।