Kolkata, बंगाल में पांच माह बाद विधानसभा चुनाव, राजनीतिक दल अभी से चुनाव जीतने के लिए जोड़-तोड़ में जुटे हैं

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Kolkata, बंगाल में पांच माह बाद विधानसभा चुनाव होना है। राजनीतिक दल अभी से चुनाव जीतने के लिए जोड़-तोड़ में जुटे हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी तीसरी बार सत्तासीन होने के लिए आतुर हैं। परंतु इस बार जंग बड़ी और कड़ी है। क्योंकि जिस तरह से लोकसभा चुनाव में भाजपा ने तृणमूल को पटखनी दी है, उससे तृणमूल प्रमुख की नींद उड़ना लाजिमी है। यही वजह है कि भाजपा को मात देने के लिए ममता ने बड़ा दांव खेला है। उन्होंने सूबे के देशद्रोह में नामजद स्थानीय दो क्षत्रपों को अपने साथ लेकर जता दिया है कि भाजपा को हराने के लिए वह कुछ भी कर सकती हैं।
इनमें एक क्षत्रप बंगाल पुलिस की फाइल में गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) समेत कई संगीन मामलों में सजायाफ्ता छत्रधर महतो हैं तो दूसरे, तीन वर्षो से यूएपीए, हत्या समेत कई मामलों में फरार रहे बिमल गुरुंग हैं। परंतु वोट के लिए दोनों ही अहम हैं तो साथ लेने में भला गुरेज क्यों? ममता को पता है कि उत्तर बंगाल और जंगलमहल की 110 विधानसभा सीटों के जरिये ही तीसरी बार जीत का सपना साकार होगा। इसीलिए एक ओर जहां उन्होंने जंगलमहल के आदिवासी नेता छत्रधर महतो को जेल से निकाल कर तृणमूल राज्य कमेटी में शामिल किया, तो दूसरी ओर उत्तर बंगाल में अलग गोरखालैंड राज्य मांगने वाले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा प्रमुख बिमल गुरुंग को घुटने पर लाकर भाजपा का 11 साल का साथ छोड़ने को मजबूर कर दिया।
बिमल गुरुंग और छत्रधर महतो ।
पहले क्षत्रप : अलग राज्य की मांग को लेकर 2017 में दार्जिलिंग में हिंसक आंदोलन हुआ था। इसके बाद ममता सरकार ने गुरुंग के खिलाफ हत्या, आर्म्स एक्ट, यूएपीए, देशद्रोह समेत 150 से अधिक मुकदमे दर्ज करा दिए। वह तीन वर्षो तक गिरफ्तारी से बचने के लिए मारे-मारे फिरते रहे। परंतु 21 अक्टूबर को अचानक गुरुंग कोलकाता में दिखते हैं और एक पांच सितारा होटल में बैठकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से नाता तोड़ने और ममता को तीसरी बार सीएम बनाने के लिए तृणमूल का साथ देने की घोषणा करते हैं।
यहीं से सवाल उठ रहा है कि आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि जिसे सीआइडी तीन वर्षो से तलाश रही थी, वह कोलकाता पहुंचते हैं और उनकी गिरफ्तारी क्यों नहीं होती? इतना ही नहीं, इधर गुरुंग ने भाजपा को हराने की घोषणा की तो उधर कुछ मिनट बाद ही ममता बनर्जी ने ट्वीट कर एनडीए से नाता तोड़ने के लिए उनका स्वागत किया। यहां खेल क्या हुआ? यह फिलहाल रहस्य है। तृणमूल को पिछले चुनाव में यहां हार का सामना करना पड़ा था। यही वजह है कि ममता ने गुरुंग को साधा है, ताकि चुनाव में सफलता मिल सके।
दूसरे क्षत्रप : माओवाद प्रभावित रहे जंगलमहल के पांच जिलों के आदिवासियों के बीच प्रभावी रहे छत्रधर महतो को लेकर तृणमूल ने दांव खेला है। वर्ष 2008 में बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के काफिले को माओवादियों ने लैंडमाइन से उड़ाने की कोशिश की थी। जब पुलिस ने कार्रवाई शुरू की तो छत्रधर ने पुलिस संत्रस विरोधी जनसाधरण कमेटी (जिसे बाद में माओवादियों का फ्रंट लाइन संगठन कहा जाता था) गठित कर आंदोलन किया था। उस दौरान विपक्ष में रहते हुए ममता ने छत्रधर का खूब साथ दिया था। इसका लाभ तृणमूल को 2011 के चुनाव में मिला और लालदुर्ग (माकपा का गढ़) कहे जाने वाले जंगलमहल में तृणमूल को जबर्दस्त जीत मिली।
इधर बुद्धदेव के काफिले को लैंडमाइन से उड़ाने के प्रयास समेत अन्य कई माओवादी हमलों के मामले में वर्ष 2009 में छत्रधर की गिरफ्तारी के बाद वर्ष 2015 में उसे राष्ट्रद्रोह के मामले में उम्रकैद की सजा हो गई। वर्ष 2016 में ममता फिर सीएम बनीं। पर वह जेल में ही कैद रहे। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में जब भाजपा ने जंगलमहल में जबर्दस्त जीत दर्ज की तो तृणमूल को छत्रधर की याद आ गई। पहले छत्रधर के पुत्र को सरकारी नौकरी दी गई। इसके बाद उन्हें जेल से निकालने की कवायद शुरू हुई। 19 अगस्त 2019 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने छत्रधर की सजा कम कर दी। दस साल बाद इसी वर्ष एक फरवरी को जेल से रिहा होने के बाद 23 जुलाई को ममता ने छत्रधर को तृणमूल की राज्य कमेटी में शामिल कर लिया। दरअसल, यह सब तृणमूल की जंगलमहल में खिसकी हुई जमीन वापस पाने की कवायद है। क्योंकि जंगलमहल में 56 विधानसभा सीटें हैं और यहां आदिवासी वोट निर्णायक है, जिसे महतो के सहारे साधा जा रहा है। हालांकि इस बीच छत्रधर के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी सक्रिय हो गई है।(UNA)