Kolkata:- बीजेपी की शह पर हर चीज को एक ही नजरिए में रंग देने की आदत जड़ बना रही है, – ममता

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Kolkata पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच मोटे तौर एक बात कॉमन है। दोनों विपक्षी नेता हैं। अखिलेश उन 15 नेताओं में भी हैं, जिनको ममता ने पिछले दिनों लेटर लिखा। ममता ने समर्थन मांगा था बीजेपी विरोधी मोर्चा बनाने के लिए। पत्र में ममता ने कहा था कि भारत के संघीय ढांचे पर सुनियोजित तरीके से हमला किया जा रहा है। देश में बीजेपी की शह पर हर चीज को एक ही नजरिए में रंग देने की आदत जड़ बना रही है, यह दावा किया था ममता ने। और कहा था कि इससे देश की लोकतांत्रिक परंपराएं खत्म हो जाएंगी।
इस समानता के अलावा एक और कॉमन बात है अखिलेश और ममता के बीच। हाल में दोनों ने ही सार्वजनिक रूप से जताया कि वे हिंदू हैं। ममता चुनाव प्रचार के दौरान कई मंदिरों में गईं। उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले वह कोई कम हिंदू नहीं हैं। ममता ने चंडी पाठ किया और यह भी जताया कि वह ब्राह्मण हैं।
यह जो चंडी पाठ है, इसमें महिषासुर पर देवी दुर्गा की विजय गाथा है। इसे दुर्गा सप्तशती या देवी महात्म्य भी कहा जाता है। यह कथा एक तरह से बंगाली संस्कृति में रची-बसी है। दशकों से हर साल महालया के अवसर पर भोर में ऑल इंडिया रेडियो पर इसे सुनाया जाता रहा है। रेडियो शो में महिषासुरमर्दिनी का पाठ होता है। लोगों के बीच बिना किताब के इसका पाठ करने के लिए काफी हौसला चाहिए। इसी बात को ममता के हिंदू होने के सबूत के रूप में पेश किया गया।
उधर, अखिलेश इतने सौभाग्यशाली नहीं रहे कि सबके बीच इस तरह का कोई काम कर सकें। वह कोविड पॉजिटिव भी हो गए। बताया गया कि कुंभ स्नान करने के अलावा वह हरिद्वार में एक जानेमाने संत का आशीर्वाद लेने गए थे। समझा जाता है कि संत पहले ही कोरोना की चपेट में आ चुके थे। हालांकि वह पॉजिटिव हुए बाद में। यह दलील दी जा सकती है कि ममता और अखिलेश, दोनों हिंदू हैं, लिहाजा उन्होंने जो पूजा-पाठ या चंडी पाठ किया, उससे उनके सेक्युलर राजनेता होने पर सवाल नहीं उठता।
लेकिन ममता और अखिलेश उन विपक्षी नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने 2014 के बाद से ही तमाम करतबों से लोगों को यह दिखाने की कोशिश की है कि वे हिंदू हैं। गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने खुद को दत्तात्रेय ब्राह्मण दिखाने का प्रयास किया था। ममता ने भी अपने गोत्र का ऐलान कर बताया कि उनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

इसके साथ ही, जो हिंदू विपक्षी नेता हैं, वे धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासतौर से मुसलमानों को राजनीति में उचित जगह देने के अपने पिछले वादों और प्रयासों पर परदा डालते दिखते हैं। वे पहले की तरह जोरशोर से ऐसे किसी विकास कार्यक्रम का वादा भी नहीं करते, जिसमें अल्पसंख्यकों की भलाई पर जोर हो। ममता और अखिलेश ने जो कुछ किया, उसकी वजह यह है कि वे बीजेपी को कोई मौका नहीं देना चाहते कि वह उन पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाए। कुछ साल पहले सोनिया गांधी ने अफसोस जताया ही था कि बीजेपी के मजबूत राजनीतिक ताकत बनने के बाद उनकी पार्टी को ‘अल्पसंख्यक समर्थक’ इमेज के कारण चुनावी नुकसान हुआ।
अपनी हिंदू पहचान दिखाने की यह जो बेचैनी है, यह एक से दूसरे नेता को अपनी चपेट में लेती जा रही है। यह सब देश के गणतंत्र बनने के समय के माहौल से ठीक उलट है। तब राजनीतिक वर्ग में आम सहमति थी कि भारत में जो बहुसंख्यक समुदाय है, वह धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासतौर से मुसलमानों को यह अहसास कराएगा कि वे सुरक्षित हैं और यहां उनके रीति-रिवाजों की इज्जत है। राजनीतिक दलों में यह अलिखित समझौता था कि हिंदू समुदाय मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का अहसास मजबूत करेगा, ठीक उसी तरह जैसे परिवार में बड़ा भाई छोटों का ख्याल रखता है।

यही वह समझ थी, जिसके दम पर बिहार के चीफ मिनिस्टर नीतीश कुमार ने 2011 में नरेंद्र मोदी को निशाने पर ले लिया। तब मोदी ने एक मुस्लिम धर्मगुरु की ओर से दी गई टोपी पहनने से मना कर दिया था। तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे मोदी, लेकिन उन्हीं दिनों अपना वह अभियान शुरू कर चुके थे, जिसने उन्हें प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया। तब नीतीश ने मोदी को जो सलाह दी थी, उसे दोहराया जाना चाहिए। नीतीश ने कहा था, ‘हमारा देश विविधताओं वाला है। यहां प्रतीकों की इज्जत की जानी चाहिए। सद्भावना बनाने के लिए कभी टोपी पहननी पड़ती है तो कभी तिलक लगाना पड़ता है।’
इस तंज के बमुश्किल आठ साल बाद हालात बदल गए। मुसलमान जो टोपी पहनते हैं, उसे पब्लिक लाइफ में पहनना जरूरी नहीं रह गया। यही नहीं, ममता और अखिलेश की तरह तमाम नेता अपने हिंदू प्रतीकों का प्रदर्शन करने में जुट गए। नीतीश कुमार का हाल तो सबके सामने है ही। प्रधानमंत्री ने भी विरोधियों पर ‘न्यू इंडिया’ के तौरतरीकों का ख्याल रखने का दबाव बनाया है। इसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों के हितों की फिक्र करने से राजनीतिक नुकसान हो सकता है।
विपक्षी दल दरअसल अपने इस अनुमान से प्रभावित हैं कि मोदी और उनकी सरकार के कामकाज में लोगों को जो भी कमियां दिखती हों, एक ‘उपलब्धि’ उनकी नजर में रहती है। यही कि उन्होंने मुसलमानों को ‘टाइट’ कर दिया है। कई राज्यों में बीजेपी के सामने जो विपक्ष है, वह दरअसल उसी की बी-टीम जैसा है। अरविंद केजरीवाल या उनकी आम आदमी पार्टी को ही देख लीजिए। राज्य सरकार को कमजोर करने का आरोप ये बीजेपी पर लगाते रहते हैं, लेकिन चाहे कश्मीर हो, नागरिकता का मुद्दा हो, धर्मांतरण का मसला हो या कथित लव जिहाद के कानूनों की बात हो, इनके बारे में बीजेपी के हर फैसले पर ये चुप रहते आए हैं। दिल्ली के सीएम खुद को भगवान हनुमान का भक्त बताने से भी नहीं चूकते।
अखिलेश ने भी हाल के वर्षों में, खासतौर से साल 2017 के बाद से हिंदू राष्ट्रवादी नीतियों पर शायद ही कभी कोई सवाल किया हो। उनका यह रवैया उनके पिता के तीन दशक पहले के रुख के उलट है। अक्टूबर 1990 की बात है। विश्व हिंदू परिषद ने ऐलान किया था अयोध्या में विवादित जगह पर कार सेवा करने का। तब यूपी के सीएम रहे मुलायम सिंह यादव ने वादा किया था कि उस दिन अयोध्या में ‘एक चिड़िया भी पर नहीं मार सकेगी।’ ममता की बात करें तो इस बार के असेंबली इलेक्शन में उन्होंने कम मुसलमानों को टिकट दिया।
ममता और अखिलेश में एक और बात कॉमन है। दोनों ने प्रशांत किशोर का सहारा लिया है चुनाव प्रचार में। मोदी जब गुजरात के सीएम थे, उन दिनों में प्रशांत उनके साथ चुनाव रणनीतिकार के रूप में जुड़े। उसके बाद से वह प्रवचन देते रहे हैं कि विचारधारा और नीतियों से प्रतिबद्धता की कोई जरूरत नहीं। अपनी इस सोच के साथ वह राजनीतिक रूप से विरोधी खेमों में आवाजाही करते रहे।
प्रशांत का प्रभाव ममता के उस पत्र पर देखा जा सकता है, जो उन्होंने विपक्षी नेताओं को लिखा। यह चुनाव बाद कांग्रेस के साथ गठजोड़ की राह खोलने की कोशिश थी। लेकिन ऐसा करते हुए ममता ने बीजेपी के वैचारिक कार्यक्रमों की आलोचना नहीं की। उन्होंने संसद से उस कानून के पारित होने का हवाला दिया, जिसने दिल्ली सरकार के अधिकार सीमित कर दिए। ममता ने कहा कि यह सबूत है इस बात का कि मोदी सरकार ‘भारत में एक पार्टी का राज’ कायम करने का इरादा रखती है। लेकिन ममता के लेटर में आर्टिकल 370 और जम्मू कश्मीर का राज्य का दर्जा खत्म किए जाने का जिक्र नहीं था। लेटर में विपक्षी दलों से साझा मकसद के लिए एकजुट होने की अपील की गई। लेकिन एक भी बात वैचारिक आधार वाली नहीं थी।
ममता ने विपक्षी दलों से समर्थन इसलिए नहीं मांगा कि बहुसंख्यकवाद के हमले से भारत को बचाना है। इस बारे में उनकी चिंता नहीं झलकी कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को राजनीतिक तौर पर लगातार हाशिए पर धकेला जा रहा है। इस लेटर से यह साफ हो गया कि चुनाव का एजेंडा मोटे तौर पर बीजेपी ने सेट किया है और टीएमसी उसका जवाब दे रही है। अभी बंगाल में लाखों वोटरों को वोट देना है। लेकिन राजनीतिक तौर पर बीजेपी चुनाव जीत चुकी है, यह साफ दिख रहा है। चुनावी तौर पर भी उसे जीत मिलेगी या नहीं, यह 2 मई को पता चलेगा।

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